- डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा
अव्यावहारिक योजनाएं और जिद किस तरह से किसी देश को रसातल पर ले जा सकती है इसका ताजातरीन उदाहरण श्रीलंका में देखा जा सकता है। पूर्ववर्ती सरकार की जैविक खेती की जिद ने ऐसा संकट खड़ा किया कि श्रीलंका आज दोराहे पर खड़ा हो गया। गंभीर संकट के साथ ही सत्ता गई सो अलग। श्रीलंका में सत्ता के खिलाफ प्रदर्शन और यहां तक कि राष्ट्र्पति आवास तक घेरने के समाचार दुनिया के देशों ने टीवी चैनलों के माध्यम से देखे हैं। हां इसके लिए अवश्य श्रीलंकावासियों की सराहना की जानी चाहिए कि इतने व्यापक स्तर पर प्रदर्शन और सत्ता परिवर्तन के बावजूद लोगों ने सार्वजनिक या निजी संपत्तियों को नुकसान नहीं पंहुचाया तो वहां के पुलिस प्रशासन और सुरक्षा बलों ने भी पूरे संयम से काम लिया और अनावश्यक रुप से लोगों को खदेड़ने या बल प्रयोग करने से परहेज ही किया। जबकि दुनिया के दूसरे किसी भी देश का ऐसा उदाहरण संभवतः नहीं मिलेगा जहां इतना बड़ा आंदोलन और प्रदर्शन बिना किसी बारदात के हो जाए। इसे सच्चा देश प्रेम कहा जा सकता है तो देशवासियों की देश और देश की संपत्ति के प्रति अपनापन।
दरअसल श्रीलंका की पूर्व सरकार के पतन के अन्य कारणों के साथ ही प्रमुख कारण देश में अन्न संकट का होना रहा है। अन्न संकट का कारण भी वहां की नई नीति रही और श्रीलंका सरकार की जैविक खेती की जिद ही उसे गंभीर संकट में धकेल दिया। सरकार ने 2021 में श्रीलंका में सभी प्रकार के रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के उपयोग पर रोक लगा दी। इसके साथ ही देश के 20 लाख किसानों को जैविक खेती का तुगलकी आदेश थमा दिया। तुगलकी इस मायने में कि किसी भी प्रयोग को करने से पहले उसके संभावित परिणाम को अवश्य समझना चाहिए। दरअसल कोई भी नया प्रयोग किया जाता है तो उसके लाभ हानि का आकलन करने के साथ ही चरणवद्ध तरीके से लागू करने का निर्णय किया जाता है। इसके साथ ही यह निर्णय भी इस मायने में गलत समय पर लिया गया कि उस समय श्रीलंका के किसान चावल की खेती की तैयारी में जुट चुके थे। अचानक आये निर्णय से किसान भोचक्के रह गए और इस निर्णय का विरोध भी काफी हुआ। यह सब तो तब है जब राजपक्षे ने 2019 में चुनाव अभियान के दौरान देश को दस सालों में जैविक खेती की और ले जाने का वादा किया था, पर एकाएक दूसरे ही साल 2021 में पूरी तरह जैविक खेती की जिद और रासायनिक उर्वरकों व कीटनाशकों पर रोक का सीधा सीधा असर सामने आ गया और श्रीलंका गंभीर खाद्यान्न संकट की चपेट में आ गया।
हांलाकि 2019 के आतंकी हमलों के बाद से ही हालात बिगड़ने शुरु हो गए थे क्योंकि श्रीलंका का पर्यटन उद्योग इन आतंकी हमलों से बुरी तरह प्रभावित हुआ। उसके बाद के दो साल कोरोना की भेंट चढ़ गए तो रही सही कसर एकाएक जैविक खेती के आदेश ने पूरी कर दी। रुस यूक्रेन युद्ध के बाद तो हालात और भी बदतर हो गए। मीडिया समाचारों को सही माने तो श्रीलंका के लोग गंभीर खाद्यान्न संकट से जूझ रहे हैं यहां तक कि अधिकांश लोगों को एक समय का ही भरपेट खाना मिल पा रहा है तो दूसरी और पेट्र्ोल आदि की देशव्यापी किल्लत हो गई है। हालात यह कि दुनिया के देश श्रीलंका को मदद को तैयार नहीं है। हांलाकि भारत ने सच्चे पड़ोसी होने का रिश्ता निभाते हुए श्रीलंका को सहायता उपलब्ध कराई है। हांलाकि चीन इन हालातों का फायदा उठाने की तैयारी मंें हैं पर उसक मंसूबे शायद ही पूरे हो।
मुद्दे की बात यह है कि जब हालात बद से बदतर होते दिखे तो सरकारों को निर्णयों की समीक्षा करने में देरी नहीं करनी चाहिए। कोरोना के बाद से दुनिया के देशों के आर्थिक हालात खराब चल रहे हैं। अमेरिका, इंग्लैण्ड, पाकिस्तान ही नहीं दुनिया के अधिकांश देशों की अर्थ व्यवस्था बुरी तरह से प्रभावित हुई है। कोरोना के कारण पर्यटन उद्योग की तो पूरी तरह से कमर ही टूट गई है। रही सही कसर ेलंबे खिंचते रुस यूक्रेन युद्ध ने पूरी कर दी है। और अब चीन ताइबान में तनाव सामने हैं। मजे कि बात यह है कि कोरोना जैसी महामारी से पूरी तरह मुक्त नहीं होने के बावजूद दुनिया के देशों ने जिद नहीं छोड़ी है और एक दूसरे खिलाफ जंग को आमादा है। यह वास्तव में निराशाजनक स्थिति है।
सौ टके की बात यह है कि जिस तरह से हमारे देश में किसानों के तथाकथित विरोध को देखते हुए सरकार ने कृषि कानून वापिस लेने का निर्णय किया वैसे निर्णय लेने में सरकारों को नहीं हिचकना चाहिए। हांलाकि किसी कानून को लेकर मतभेद होना अलग बात है पर इस हद तक विरोध भी विचारणीय हो जाता है। खैर श्रीलंका में यदि चरणवद्ध तरीके से और सरकार अपने चुनावी वायदे के अनुसार दस सालों में जैविक खेती की राह पकड़ती तो संभवतः यह संकट श्रीलंकावासियों को नहीं देखना पडता। फिर जब पहली छमाही में ही दुष्परिणाम सामने आ गया तो फिर श्रीलंका सरकार को उसकी समीक्षा करने में देरी नहीं करनी चाहिए थी। आखिर सरकार किसके लिए होती है। सरकार होती है देश के नागरिकों के लिए। उनके हितों और देशहित की ही अनदेखी होने लगती है तो परिणाम श्रीलंका जैसे आने में देरी नहीं होगी। ऐसे में सरकारों को योजनाओं व कार्यक्रमों को लागू करते समय उनके परिणामों को भी समझ लेना चाहिए। तुगलकी निर्णय के हमेशा दुष्परिणाम ही मिलते हैं यह ध्यान रखना ही होगा।
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