सियासत की हांडी में पकता वोटबैंक...!
| -Priyanka Maheshwari - Jan 9 2019 3:38PM

प्रियंका वरमा माहेश्वरी/ दो उपचुनावों की हार से भाजपा के जादू का असर फीका पड़ना शुरू हो चुका था, रही सही कसर एस/एससी एक्ट में बदलाव लाकर लोगों की नाराजगी ने पूरी कर दी और अब तीन राज्यों में भाजपा की हार उसका मनोबल गिराने के लिए काफी है। कुछ ही समय में लोकसभा चुनाव होने वाले हैं और भाजपा ने अपना चुनावी दांव खेलना शुरू कर दिया है। वोटों की राजनीति साधने के लिए भाजपा ने रामलीला मैदान में 'समरसता भोज' का आयोजन किया।  करीब तीन लाख अनुसूचित जाति के परिवारों से एक-एक मुट्ठी दाल-चावल इकट्ठा करके 5000 किलो की 'समरसता खिचड़ी' बनाने का लक्ष्य रखा गया और इस खिचड़ी भोज द्वारा दलितों से अपील की गई की वोट भाजपा को दिया जाए।

भाजपा का दलित वोट साधने का यह प्रयास पहला है ऐसा नहीं है, इससे पहले योगी आदित्यनाथ और उनके मंत्रियों ने उत्तर प्रदेश में दलितों के घर भोजन करके दलित राजनीति साधी थी | यहां यह बताना भी जरूरी है कि दलित के घर में मंत्री स्वाति सिंह ने रोटियां सेकीं थी और बाद में मुख्यमंत्री ने भोजन ग्रहण किया था।इसके आलावा सरकारी पैसों से दलित प्रेम के आयोजन का सच जनता के सामने भी खुल गया था | अब यह दलित प्रेम की राजनीति फिर से शुरू हो गई है। समरसता खिचड़ी के आयोजन के जरिए दलितों को फिर से अपनी ओर खींचने का कार्यक्रम शुरू कर दिया गया है। हालांकि इस आयोजन में दो लाख लोगों को इकठ्ठा करने का लक्ष्य रखा गया था लेकिन हजार आदमी भी इकट्ठा ना हो पाये। दूसरा दांव भाजपा 'आरक्षण' का खेल रही है। सामान्य वर्ग में आने वाले आर्थिक रूप से कमजोर तबके को नौकरी और शिक्षा में 10%आरक्षण देने का बिल भी लोकसभा से पारित हो गया है, लेकिन नाराज युवा वर्ग आरक्षण के बजाय रोजगार की मांग कर रहा है। अगर रोजगार नहीं तो आरक्षण का क्या लाभ? यहां यह भी बताना उचित होगा कि कुछ ही दिन पहले क़ानून मंत्री रवि शंकर प्रसाद ने न्यायपालिका में भी आरक्षण देने का बयान दिया था लेकिन उस पर अभी तक कोई पहल नहीं हुई है |

विधानसभा चुनावों में भाजपा की ताजातरीन हार जिसे प्रधानमंत्री हार नहीं मानते फिर भी लोकलुभावन बातों की बारिश फिर से शुरू हो चुकी है। आने वाले कुछ समय में मंदिर और किसान के मुद्दे भी ज्वलंत होंगे। हालांकि तीन राज्यों की हार के बाद तेल 82 से 68, जीएसटी 28% से 18% और गैस 952 से 660 होने का  हल्ला  है। वैसे देखा जाए तो अभी भी देश में मोदी मैजिक बहुत कमजोर नहीं पड़ा है। लोग अभी भी उम्मीदों का बस्ता खोले बैठे हैं। तीन राज्यों की जीत के दम पर कांग्रेस 2019 के चुनाव में बाजी मार लेगी इसमें अभी संदेह है? कांग्रेस के लिए लोकसभा चुनाव चुनौतियों से भरा होगा।

सियासत की हांडी में वोटों की खिचड़ी पकी कि नहीं? भाजपा का दांव फिर से चलेगा कि नहीं? और कांग्रेस कितना दमखम दिखा पाएगी यह 2019 में भी यक्ष प्रश्न ही है...।



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