वे कभी विरोध नहीं करते...
| - Ajay Chandravanshi - Apr 21 2019 1:55PM

          वरिष्ठ कवि युगल गजेंद्र बिना किसी ताम-झाम के रचनाकर्म करते रहे हैं। सम्भवतः इधर कविताएं भी पत्र-पत्रिकाओं में नही भेजते, इसलिए उनकी रचनाएं देखने को नही मिलती। मगर उनका एक काव्य संग्रह 'वे कभी विरोध नहीं करते' प्रकाशित हुआ है। इस संग्रह की कविताओं के तेवर देखकर उनके काव्य सरोकार और काव्यात्मक क्षमता का पता चलता है। कहना न होगा कि वे हमारे समय के एक जरुरी कवि हैं। कविताकर्म में जितनी संवेदना की जरूरत होती है; उतना ही ज्ञान का भी। इसी को मुक्तिबोध ने 'ज्ञानात्मक संवेदना और संवेदनात्मक ज्ञान' कहा है। बहुधा कवि ज्ञानात्मक पक्ष को कम महत्व देते रहे हैं और 'ज्ञान' और 'विचार' से 'परहेज' करते रहे हैं। कुछ तो इन्हें 'अकाव्यात्मक' भी मानते रहे हैं। बहरहाल हर कविता का अपना एक 'वैचारिक पक्ष' होता है, भले महज विचार कविता न हो।

             युगल गजेंद्र जी की कविताओं में वैचारिकता मुखर है। वे जितना अपने आस-पास घटित हो रहे सामाजिक-राजनैतिक घटनाक्रमों को देखते हैं, उतना ही वैश्विक राजनितिक घटनाक्रमों पर नज़र रखते हैं।इस तरह वे परिवेश से पलायन नही करते, वरन परिवेश को व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखते हैं।आज जिस तरह वैश्वीकरण के नाम पर बाज़ारवाद हमारे घर तक पहुंच गया है, घटनाओं की स्वायत्तता नही रह गई है। फिर रचनाकर्म अपने अपने सामाजिक-राजनैतिक आकांक्षाओं के प्रकटन का माध्यम भी है।रचनाओं में रचनाकार के सरोकार प्रकट होते ही हैं।

            युगल गजेंद्र ने कविताओं में विकास के नाम पर जल-जंगल-ज़मीन के अनियमित विवेकहीन दोहन तथा उससे उपजे समस्याओं जैसे विस्थापन की समस्या या पर्यावरण की क्षति पर चिंता और आक्रोश व्यक्त किया है।जैसे- 'नदी का अपहरण' और 'किसी पेड़ का कटना','किसी पेड़ की मौत पर' में।विवेकहीन बांध का निर्माण 'विकास' नही 'नदी का अपहरण' है; क्योकि इससे केवल नदी खत्म नही होती उसके साथ एक संस्कृति भी खत्म हो जाती है।इसी तरह किसी पेड़ का कटना, पेड़ का कटना भर नही होता, उससे धरती, हवा, मिट्टी,नदी, चिड़िया सब प्रभावित होते हैं। कवि को आश्चर्य होता है कि किसी पेड़ की मौत पर कुछ भी नही होता। मगर यह 'कुछ भी न होना/भविष्य में/ बहुत कुछ होने को तय करता है'।

             साम्राज्यवादी ताकतें अपने स्वार्थ के लिए दूसरे देशों की संप्रभुता पर हमला करते हैं, वह भी 'न्याय' के नाम पर। तमाम अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं उनके अधिकार क्षेत्र में हैं। लीबिया, इराक, बोस्निया, वियतनाम, फिलिस्तीन, अफगानिस्तान पर हस्तक्षेप को कवि ने इसी नज़र से देखा है।इसकी प्रतिक्रिया होनी ही थी; इसकी एक नकारात्मक प्रतिक्रिया तालिबान जैसे साम्प्रदायिक संगठनों का उभार भी है। तालिबान द्वारा बामियान के बुद्ध की मूर्ति को तोड़ा जाना हर शांतिप्रिय संवेदनशील व्यक्ति को आहत किया था। 'बामियान में बुद्ध' कविता इसी संदर्भ में है।साम्राज्यवादी ताकतों ने अब अपना चेहरा बदल लिया है; अब वे "विश्व विजय की घोषणा नही करते/ वे अब मुक्त व्यापार की बात करते हैं"।'बाल्को' के "नीलाम होने" को इसी संदर्भ में देखा जा सकता है।

           इधर आतंकवाद, नक्सलवाद, लूटपाट की घटनाओं में लगातार वृद्धि होती गई है। देखा जाय तो इनमें मुख्यतः आम-आदमी, आम सुरक्षाबल ही मारे जाते हैं; 'बड़े' लोग केवल श्रद्धांजलि और शोकसभा करके अपने 'कर्तव्यों' का निर्वहन कर लेते हैं।होता तो यह भी है कि "शांति की अपील में जुड़े इन हाथों में" "बीती रात के दंगों के खून" होते हैं। इन सबके बीच आम आदमी सबकुछ सहते चला जाता है, कोई विरोध नही करता। जाहिर है इससे आततायी का हौसला बढ़ता चला जाता है। कवि इस प्रवृत्ति की तीखी आलोचना करता है। 'वे कभी विरोध नही करते', 'गुलाम' कविता में यही ध्वनित है। निष्क्रिय अच्छाई से समाज को क्या फायदा? "अच्छे लोग अच्छे होते हैं/ बुरे लोग भी/ यही कहते हैं"।

             कवि समाज के विषमताओं, विडम्बनाओं पर आक्रोश व्यक्त करता है तो इसलिए कि उसे मेहनतकशों से प्रेम है; वह समतावादी समाज की चाह रखता है। जिसमे रिक्शावाले, कम्बलवाले जैसे लोगों को पर्याप्त सुविधाएं मिले।मगर आज इस गणतंत्र में जन-मन "ढूंढता है खुद को उस इंद्रजाल में/गणतंत्र के उस विराट उत्सव में"।विषमता अवश्य है मगर कवि को उम्मीद है कि व्यवस्था में बदलाव हो सकता है; जरूरत है संगठित होने, अपनी-अपनी भूमिका निभाने की। इसलिए कवि घोषणा करता है कि "मेरे लिए कविता का अर्थ है, प्रतिरोध!"। और भी "ऐसे समय मे जब मांग रहा हो महाकाल/ दधीचि से अस्थियों का दान/ आओ थोड़ी से नमी दे/ दे सूरज की आग/ धरती में दबी बीजों को"

           सौंदर्यशास्त्र बहुधा कुलीनतावाद से प्रभावित रहा है, जहां सौंदर्य का पर्याय 'गुलाबी त्वचा', 'सुकोमलता' से लिया जाता रहा है। मगर कवि श्रम के सौंदर्य का उपासक है, जो रंगों के हीनता-उत्कृष्टता को नही मानता। सभ्यता के किसी चरण में नग्नता मजबूरी रही होगी मगर आज उसे 'उत्कृष्टता' का पैमाना नही बनाया जा सकता। कपड़े शरीर के सुरक्षा के लिए भी होते है। अवश्य देह कोई रहस्यमय 'वस्तु' भी नही है कि उसे 'अलौकिक' बना दिया जाय। इस श्रम के सौंदर्य के लिए कवि कैक्टस का प्रतीक चुनता है जो सुविधा के अभाव में विषमता में भी उग आता है; ऐसे में उसमे प्रतिरोध स्वरूप कुछ कांटे उग आएं तो आश्चर्य क्या?इस सौंदर्यबोध का विषमता और विडम्बना से क्या सम्बन्ध है 'तब नही लिख पाता' कविता में देखा जा सकता है।कवि प्रकृति, फूल, लोक सौंदर्य का उपासक है मगर "हर बार समाने आ जाती है/ऊंची ऊंची चिमनियां/ उनसे निकलता धुंआ/ दूर-दूर तक फैली उदास झुग्गियां/तब नही लिख पाता मैं/किसी/फूल, नदी या आकाश पर कविता"।

         संग्रह में ऐसी कविताएं भी हैं जहां कवि के उत्कट प्रेम और संवेदनशीलता का पता चलता है। अवश्य विषमता पर आक्रोश भी सम्वेदना से ही उपजती है। फिर भी यहां प्रेम है, बेटी है, माँ है।माँ और बेटी के रूप में स्त्री का प्रेम है तो उसकी संघर्ष और विडम्बना भी है। कुल मिलाकर संग्रह की कविताओं में विविधता है; मगर मुख्य स्वर आक्रोश और प्रतिरोध का है। ये कविताएं एक तरह से बयान हैं; यहां शब्दों की जादूगरी नही है;मगर व्यंजना है। इसलिए जो कविता में  मुखरता पसन्द नही करतें; जिन्हें कविता में मौन संवाद अधिक भाता है, उन्हें शायद ये कविताएं कम पसंद आए।लेकिन जब व्यवस्था इस कदर बहरी हो जाए कि आम-जन की आवाज न सुने तो फिर रास्ता दूसरा हो जाता है। यह नागार्जुन-मुक्तिबोध-धूमिल की परंपरा है।

-अजय चन्द्रवंशी



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