राजनीति की पाठशाला में सिसक रहे मुद्दे और दम तोड़ती भाषा 
| - Saleem Raza - Apr 24 2019 3:16PM

भारतीय जनता पार्टी जिसे अटल- अडवाणी के मजबूत कन्धों औऱ दूरदर्शी सोच ने आज इस मुकाम पर पहुंचा दिया जहां से आज भाजपा खड़े होकर अपने ऊपर नाज कर रही है। लेकिन मेरी इस बात से इत्तेफाक रखने वालों की संख्या कम ही होगी। ये शब्दों का खेल नहीं है, वल्कि ये है विचारधाराओं की लड़ाई क्योंकि बेमेल विचारधारायें ही अपवाद को जन्म देती हैं , अपवाद ये है कि भाजपा को निर्देशित करने वाला संघ है जिसका राजनीति से सीधा संबंध नहीं है। ये संध कहता है लेकिन परदे के पीछे का एजेन्डा उन्हीं का होता है जिसको आगे ले जाने का काम राजनीतिक पार्टी भाजपा करने को मजबूर हो जाती है इसी वजह से कई मुद्दों पर भाजपा और संघ मे तनातनी का माहौल बना रहता है। 

इस बार का आम चुनाव अपने एक नये कलेवर में नज़र आ रहा है। ये पहली बार है जब चुनाव आयोग ने सियासत के दिग्गजों पर चाबुक चलाया है लेकिन शायद ये पर्याप्त नहीं था। क्योकि आदत से मजबूर इन सियासत के कलाकारों ने चुनाव से पहले जिस तरह देश की तस्वीर पेश करी उसे देखकर और सुनकर हैरानी हो गई। आज दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र कहे जाने वाले देश हिन्दुस्तान की गंगा-जमुनी तहजीब को ही तार-तार करके रख दिया है संसद की गरिमा शर्मसार कर दी और संसद के मंदिर मे बैठने वाले खुद मर्यादाओं का चीर हरण करने पर उतारू है। इन लोगों ने शालीन भाषा को दफन कर दिया और अभद्र भाषा को जन्म दिया है क्या सियासत इसी को कहते हैं ,जहां मुद्दों को कफन पहना दिया जाता है और लोकतंत्र को काल कोठरी में पहुचाने की पटकथा लिखी जाती है ये समझने की बात है। ये बात है अपने विवेक को अपने काबू में रखने की क्योंकि अति महत्वाकांक्षी होने से स्वार्थ की बू आने लगती है। 

बड़े शर्म और अफसोस की बात है कि आज चुनावी मंचों पर जिस तरह के भाषण सुनने को मिल रहे है या टीवी डिबेट में जिस तरह से एक दूसरे पर चरित्र की काली स्याही उकेरी जा रही है सच मानों ऐसा लगता है कि हिन्दुस्तान जाहिलों का देश है। यहां आप देख लीजिए किस कदर महिलाओं के सम्मान में कसीदे पढ़े जाते है जो निहायत बेहूदे पन की निशानी है। यहां न उम्र की सीमा है और न ही रिश्तों का बन्धन। आज सार्वजनिक मंचों से हिन्दुस्तानको अग्रणी देशों की कतार में खड़ा बताया जा रहा है इसके मायने साफ है कि हमारे देश में साक्षरता दर बढ़ी है लेकिन सव्र नहीं होता पूरा घटनाक्रम देख कर हमें अपने साक्षर होने पर ही ग्लानि होती है। 

हम पढ़े लिखे होकर भी विश्व मानचित्र पर अनपढ़ जाहिल कहलाये जायें तो ऐसा लगता है कि हम अभी भी 72 साल पीछे ही खड़े हैं। देश की आजादी के बाद जब हमारे देश में पढ़े लिखे लोगों का फीसद मात्र 18 फीसद था तबकी अनुमानित कुल जनसंख्या तकरीबन 27 करोड़ रही होगी लेकिन गुलामी की जिन्दगी और अपने अधिकारों और बुनियादी जरूरतों के अभाव में हमारे पूर्वजों ने जंग छेड़कर अंग्रेजों को हिन्दुस्तान के बाहर का रास्ता दिखाया था,उस वक्त उन लोगों में एक संकल्प था, एक दूसरे के प्रति सम्मान और देश के लिए मर मिटने का जज्बा था और आज जब हमारे देश में साक्षर फीसद तकरीबन 78 फीसद कुल जनसंख्या का है और हम जिस तरह से अपने अघिकारों अपनी बुनियादी जरूरतों के लिए संघर्ष कर रहे हैं जिसे देखकर नहीं लगता कि हम आज भी अंग्रेजों के न होकर अपनों की गुलामी की जंजीरों में जकड़े हुये है। क्या आज की परिस्थिति को देखकर नही लगता कि एक बार फिर 1947 वाला इतिहास दोहराया जाना चाहिए। 

आज हालात ये हैं कि देश का युवा रोजगार से महरूम, खेत में किसान परेशान, तार-तार हो रहा महिलाओं का सम्मान जब देश में रोजगार नहीं है, तनख्वाह न दे पाने की वजह से कर्मचारियों को निकालने का षडयंत्र चल रहा हो फिर भी देश की अर्थव्यवस्था मजबूत ऐसे चमत्कारी सियासी गुरूओं की छत्रछाया में देश तरक्की कर रहा है। अब दूसरी तस्वीर की तरफ रूख करते है आजकल सियासी मंचों पर हिन्दू-मुस्लिम आधारित तस्वीर में कलर कन्ट्रास्ट देने के लिए लोग बेताब दिखाई दे रहे हैं । पूरा वातावरण इस तरह से बनाया जाता है कि लोगों को महसूस हो कि सच है लेकिन ‘‘कमल’’ की सोशल मीडिया इंजिनियरिंग ने इस वक्त कृतिम सच्चाई की जो लेयर चढ़ाई है जिसमें लोगों को सियासी जुबान में ये बताया जा रहा है कि हिन्दुत्व खतरे में है जोे बेहद ही हास्यापद है। 

ये तो शायद सभी जानते होंगे कि देश में हर एक दशक यानि दस साल बाद जनगणना होती है तो पिछली जनगणना के मुताबिक देश की आबादी तकरीबन 121 करोड़ से ज्यादा थी जिसमें हिन्दुओं की आबादी 97 करोड़ के आसपास थी और मुसलमानों की आबादी 17.50 के आसपास थी फिर भाजपा की तरफ से ये कैसा प्रचार कि हिन्दुत्व खतरे में है। आखिर ये हिन्दुत्व किससे खतरे में है ? दरअसल ये सिर्फ वो जहरीली बाते है जो फिजा के माहौल को दूषित बनाने के साथ ज्वलन्त मुद्दों को रसातल में पहुंचा रही है।

बहरहाल कहने का मतलब ये है कि लोकतंत्र में अपनी संख्या का अहसास दिलाने वाले ही आज चाटुकारिता की सियासत का दंश झेल रहे हैं और आगे झेलेंगे, आज देश में हिन्दुत्व खतरे में बताने वाले खुद आस्था के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं। देश में यदि गरीबी खत्म हो जायेगी दलितो और अल्पसंख्यकों का नामोनिशान नहीं होगा फिर योजनाये किसके लिए बनेंगी, फिर विश्व बैंक पैसा क्यों देगा? अगर पैसा नहीं मिलेगा तो फिर सियासत के मठाधीशों की आय को दिन दूनी रात सवाय पंख कहां लगेंगे। दरअसल हमारे देश को अल्पसंख्यको से न कभी खतरा था और न ही हैं वल्कि खतरा तो अपनों को अपनों से है। खतरा है कमल को सत्ता खोने का और लड़ाई है विचारधाराओं की, दलित-मुस्लिम तो बेवजह सियासत की तलवार पर कुर्बान है। 



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