अम्बेडकरनगर: सड़ा-गला व अखाद्य मांसाहार करके बीमार पड़ रहे हैं लोग....
| -Dr. Bhupendra Singh Gargvanshi - Apr 24 2019 4:49PM

दिवाली और होली पर ही सक्रिय रहता है खाद्य सुरक्षा महकमा

हमारे देश में दूध और दूध से बने सामानों का तीन चौथाई हिस्सा मिलावटी होता है। मिलावट के लिए आमतौर पर सबसे ज्यादा डिटर्जेंट, कास्टिक सोडा, ग्लूकोज, सफेद पेंट और रिफाइंड तेल का इस्तेमाल किया जाता है। अगर यह मिलावट तुरंत नहीं रोकी जाती है, तो आने वाले समय में भारत के लगभग 87% लोग कैंसर या उसके स्तर की बीमारियां झेल रहे होंगे। हमारे देश में दूध का जितना उत्पादन होता है, खपत उससे भी 4 गुना ज्यादा होती है। देश में दूध की रोजाना खपत लगभग 64 करोड़ लीटर से भी ज्यादा है। जबकि उत्पादन करीब 15 करोड़ लीटर तक ही हो पाता है। अब सवाल यह उठता है कि यह बाकी का दूध आता कहां से है।

जाहिर सी बात है की खपत और उत्पादन के गैप को भरने के लिए दूध में मिलावट की जा रही है। आमतौर पर लोग सोचते हैं कि दूध में केवल पानी की ही मिलावट होती है। लेकिन शोध बताते हैं कि इसमें डिटर्जेंट और सफेद पेंट जैसी जहरीली चीजों की मिलावट का ट्रेंड ज्यादा है। यह मिलावट दूध को गाढ़ा दिखाने के लिए और लंबे समय तक सुरक्षित रखने के लिए भी की जाती है। ऐसी मिलावट के लिए भी डिटरजेंट, यूरिया और फार्मेलिन जैसे जहरीली चीजों का इस्तेमाल किया जाता है। देश में दूध की खपत कुछ इस कदर बढ़ चुकी है कि अब इसकी पूर्ति कर पाना मुश्किल है। जिसके कारण इस मिलावट को अंजाम दिया जा रहा है।

यह तो रही देश में दूध मिलावट की बात.......दूध और इसके अन्य उत्पाद जिसको हर आम खास खाने के प्रयोग में लाता है, इनमें लगभग सभी किसी न किसी तरह से मिलावट से परिपूर्ण होते हैं। कुछ दिन पूर्व बड़े एवं छोटे होटल, ढाबों, जलपान गृहों पर सड़े-गले माँस और बासी भोजन परोसने की जानकारी होने पर जब खाद्य सुरक्षा महकमें के जिम्मेदार से बात की गई तो उन्होंने कुछ ऐसा जवाब दिया जिसे सुनकर लगा कि जन स्वास्थ्य के दृष्टिगत इस महकमें में कार्यरत ओहदेदार मात्र अच्छी पगार पाने के लिए ही अपनी ड्यूटी कर रहे हैं।

कोई बासी खाकर मरे, कोई बिरयानी खाकर मरे या कोई सड़े-गले मटन, चिकन खाकर फूड प्वाजनिंग का शिकार हों.......। इनसे कोई लेना-देना नहीं है। ये बस होली-दिवाली एवं अन्य महत्वपूर्ण त्योहारों पर लाव-लश्कर के साथ विभागीय गाड़ी में बैठकर प्रायोजित ढंग से चुनिन्दा प्रतिष्ठानों पर जाकर छापेमारी करने का कथित अभियान चलाते हैं। बताशा, गट्टा, लड्डू व थर्ड क्लास की बर्फी का पैकेट गिफ्ट रूप में ऐसे मीडिया को पकड़ा देते हैं जो प्रायः इनको अपनी तीसरी आँख के जद में रखकर हो-हल्ला करता है। 

आज हम बात कर रहे हैं उत्तर प्रदेश के अम्बेडकरनगर जनपद की। यहाँ कायम खाद्य सुरक्षा महकमा में दर्जन भर से अधिक सरकारी मुलाजिम हैं, जिनके पास चार पहिया लग्जरी वाहन और आलीशान भवन के साथ-साथ सारी भौतिक सुख-सुविधाएँ हैं। ये लोग लाखों की पगार हर माह तो पाते ही है ठीक उससे ज्यादा होटलों, रेस्तराओं, ढाबों, दूधियों, फल विक्रेताओं से बंधी रकम के रूप में अर्जित करते हैं। खा-पीकर आम आदमी मरे इनकी बला से। किसी ने यदि मौखिक रूप से शिकायत किया तो इस महकमे के जिम्मेदार यह कहते हैं कि लिखित शिकायत करो और उसकी पैरवी मजबूती से करो, तब हमारा महकमा प्रतिष्ठानों के खिलाफ कार्रवाई करेगा। जुबानी कहने से कुछ काम नहीं बनने वाला। 

मांसाहार, होटलों पर मटन-चिकन, बीफ, बिरयानी, विभिन्न प्रकार के जानवरों का कबाब एवं अन्य प्रकार के व्यंजनों के बावत यह कहने पर कि कई स्थानों पर बासी, सड़े-गले व अखाद्य सामानों की बिक्री की जा रही है इस पर महकमें का ध्यान जा रहा है कि नही तब मुख्य खाद्य सुरक्षा अधिकारी के.के. उपाध्याय ने कहा था कि- अकबरपुर क्षेत्र रतनाकर पाण्डेय जैसे विशुद्ध ब्राम्हण के अधीन है, अब उनसे कैसे कहा जाए कि वह मटन, चिकन, बिरयानी, कबाब आदि मांसाहार की जाँच करें। उनका उत्तर सुनकर खामोश हो जाना पड़ा। 

अभिहीत अधिकारी खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन महकमा राजवंश प्रकाश श्रीवास्तव से इस सम्बन्ध में वार्ता करने के लिए सम्पर्क किया गया तो नेटवर्क की गड़बड़ी की वजह से बात नहीं हो सकी। विभागीय सूत्रों के अनुसार खाद्य सुरक्षा महकमें में यहाँ अभिहीत अधिकारी कायस्थ, मुख्य खाद्य सुरक्षा अधिकारी व दो अन्य खाद्य सुरक्षा अधिकारी ब्राम्हण दो क्षत्रिय एक अनूसूचित जाति एक ओ.बी.सी.। 

बेहतर यह होगा कि चेकिंग के उद्देश्य से ब्राम्हण और शाकाहारी खाद्य सुरक्षा ओहदेदारों को मांसाहारी होटलों, रेस्तराओं, ढाबों पर न भेजकर उन लोगों को भेजा जाए जो शाकाहारी न हों (तात्पर्य यह कि जो मांस छूने और देखने से परहेज न करता हो)। 

अम्बेडकरनगर जिले का खाद्य सुरक्षा महकमा अपने में एक विशिष्ट स्थान रखता है। यहाँ कार्यरत सभी कर्मचारी/अधिकारी एटीट्यूट में रहते हैं, इनका स्वभाव कभी लचीला तो कभी सख्त दिखता है। कहने का तात्पर्य यह कि अभिहीत अधिकारी से लेकर खाद्य सुरक्षा अधिकारी तक के ओहदेदार वर्सेटाइल परसनैलिटी के स्वामी हैं। इनसे बेहतर मीडिया प्रबन्धन और कोई नहीं जानता। मीडिया चिल्ल-पों न करे अपने श्रीमुख से ये अधिकारी घृतपान कराते हैं। अपने इस अचूक अस्त्र से लाखों की ऊपरी कमाई करने वाले इन अधिकारियों का स्वास्थ्य सबसे बेहतर है। अन्य विभाग के किसी अधिकारी ने प्रसंगवश कहा था कि- काश वह भी खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन महकमें में ओहदेदार होता.......। 

कुल मिलाकर यह कि खाद्य सुरक्षा विभाग और उसमें कार्यरत महकमें के ओहदेदारों को सचेत व सजग होना चाहिए और मिलावट, सड़ा-गला, अखाद्य पदार्थ का सेवन कर गम्भीर बीमारियों का शिकार होने वाले जन मानस के स्वास्थ्य के साथ किया जाने वाला खिलवाड़ बन्द होना चाहिए। क्या इस जिले में ऐसा सम्भव है.....?

-Bhupendra Singh Gargvanshi

Mob. 9454908400



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