आनलाइन रिश्ते....
| -RN. Feature Desk - Mar 21 2020 2:15PM

हमारी जान पहचान जरा रोचक है। हम मिले तो आभासी दुनिया में ही थे मगर वह शख्स मिला मुझे "मिली" बनकर मतलब लड़की बनकर। हमेशा दी दी करते रहता था मतलब कि करते रहती थी। हालांकि उसका व्यवहार कभी भी अवांछनीय नहीं था फिर भी यह बात मैं समझ नहीं पाई कि वह मुझ पर आकर्षित है या सिर्फ मुझे सम्मान दे रही है क्योंकि अक्सर जब मैं उसके बारे में पूछती थी तो वह यह बताती थी कि मैं ट्यूशन पढ़ाती हूं, कॉलेज से आकर घर का काम करती हूं, मां बीमार रहती है तो सारा काम भी मुझे ही संभालना पड़ता है वगैरह वगैरह। उसके बातचीत में हमेशा एक सम्मान की झलक सदैव दिखती थी और छोटी होने के कारण वह मजाक बहुत करती थी। जीजू आपको छेड़ते क्या? आप कयामत लग रही हैं, आप टेक्स्ट बहुत अच्छा लिखतीं हैं वगैरह इस तरह की बातें करते रहती थी।

अक्सर वह मेरी फोटो भी मांगते रहती थी। तब मेरी शंका बढ़ने लगती थी कि एक लड़की आखिर मेरी फोटो क्यों मांगेगी और उसकी इतनी तारीफ क्यों करेगी? लेकिन मुझे उससे कभी कोई परेशानी नहीं हुई और वो मुझे भरोसा दिलाते रहती थी अपने लड़की होने का। मुझे उस पर भरोसा इसलिए भी नहीं होता था क्योंकि लड़कियों की आदत होती है कि वह अपनी पिक हर कुछ समय बाद बदलते रहती है। लड़कियां किसी फिल्मी हीरो हीरोइन या भगवान की फोटो जल्दी से तो नहीं ही लगातीं लेकिन "दीप्ति" हां यही नाम था उसका या उसने रख रखा था अपना यह नाम।

वह सिर्फ भगवान की डीपी लगाए रखती थी और बातचीत के अंदाज से भी मुझे उस पर शक होता था कि वह लड़की ना होकर लड़का है मगर मैंने उस पर ध्यान देना छोड़ दिया था। अब कभी कभार उससे बातचीत हो जाती थी। एक दिन मैंने उससे कहा कि तुम्हारी ओरिजिनल पिक दो तो उसने मुझे अपनी पिक दी लेकिन उसकी पिक देखकर लगा कि वो उसकी खुद की तस्वीर नहीं है। फिर एक दिन मैंने उसे परखने के लिए कहा कि मैं तुम्हें वीडियो कॉल करती हूं तो उसने यह कहकर मना कर दिया कि उसके मैसेंजर में यह ऑप्शन नहीं है। इसके बाद फिर मैंने जबरदस्ती नहीं की लेकिन मन में शंका बनी रही कि वह फेक आईडी है।

दीप्ति कविता बहुत अच्छा लिखती थी और मैं उसकी कविता की तारीफ भी करती थी। उससे बात करने पर महसूस होता था कि उसके पास ज्ञान का भंडार बहुत विस्तृत है। बातचीत भी हमेशा बहुत सम्मानजनक तरीके से करती थी और यही वजह थी कि मैं उससे जुड़ी हुई थी। बातों ही बातों में एक दिन उसने मुझे बताया कि "एक व्यक्ति कविता के माध्यम से उससे जुड़े हुए हैं और उम्र में भी काफी बड़े हैं। उनसे बातचीत होते रहती है और वह कविता के माध्यम से ही अपने प्रेम का इजहार करते हैं। और भी कई विषयों पर उनसे बातचीत होते रहती है। उनमें ज्ञान भी बहुत है मगर वो मुझसे बहुत प्रेम करने लगे हैं यहां तक कि अब जीवन - मरण का प्रश्न हो गया है। मैंने उन्हें बहुत समझाया कि हमारे बीच इस तरह के संबंध संभव नहीं है मगर वो जिद पर अड़े हैं।

मैंने हर तरह से प्रयास कर लिया उन्हें समझाने का लेकिन वह प्रेम में हठ करके बैठे हैं। अब आप ही मेरी मदद कर सकती हैं"। मैंने कहा, "मैं क्या मदद कर सकती हूं तुम्हारी?" तो दीप्ति ने कहा कि, "मैंने उन्हें यकीन दिलाया कि मैं एक लड़का हूं और ये मेरी फेक आईडी है लेकिन वो यकीन नहीं कर रहे हैं। आप उनसे बात करके कहिए कि मैं लड़का हूं"। तब मैंने दीप्ति से कहा कि, "पहले मुझे तो यकीन कर लेने दो कि आप वाकई में लड़के हो उसके बाद यकीन दिलाऊं किसी को"। पहले वह हिचकी फिर बाद में उसने हामी भरी। मैंने फोन लगाकर उससे बात की और मुझे यकीन हुआ कि वह एक लड़का है और मैंने उससे कहा कि, "मुझे शुरू से ही शंका थी कि तुम लड़के हो लड़की नहीं और मेरी शंका सही साबित हुई।

मगर मैं तुमसे सिर्फ इसलिए जुड़ी हुई हूं क्योंकि तुमने कभी कोई अश्लील हरकत नहीं की"।  मैंने कहा कि, "मैं कोशिश करती हूं और फिर मैंने उस व्यक्ति से बात की और उन्हें यकीन भी दिलाया कि वह एक लड़का है और यह रिश्ता सही नहीं है। और कहा कि एक बार आप फोन पर उससे बात जरूर करें।" दीप्ति को मैंने ब्लाक नहीं किया बल्कि उससे जुड़ी रही और फिर उसकी ओरिजिनल आईडी से भी जुड़ गई। उसका असली नाम महेश था। दीप्ति उर्फ महेश अब मुझे पहले से ज्यादा सम्मान और प्रेम देने लगा था। हालांकि मैंने उसे आगाह कर रखा था कि अगर मर्यादा लांघी तो आप ब्लॉक हो सकते हैं।

दीप्ति उर्फ महेश ने कभी भी मर्यादा नहीं लगी अगर कभी वो भटकता भी था तो मैं उसे आगाह कर देती और वह संभल जाता। उसका प्रेम और स्नेह ही था कि कभी भी उसने ओछी हरकत नहीं की। जबसे दीप्ति उर्फ महेश अपने असली रूप में आया तब से हमारी बातचीत लगातार होने लगी। हमारी बातचीत अक्सर कविताओं को या किसी सामाजिक और कभी धार्मिक तो कभी शैक्षिक विषयों को लेकर होते रहती थी। बात करते-करते महेश अपने प्रेम का इजहार भी कर देता था जिसे मैं हंस कर टाल जाती थी। कभी कह देती थी कि वक्त नहीं रहा इन सब बातों का अब या ऊब होती है इन सबसे। महेश चुप हो जाता और कहता कि आपके लिए मन मे बहुत सम्मान है और प्रेम तो हैय्यै ही"। मैं निरूत्तर हो जाती। कभी कभी लगता कि प्रेम व्यक्ति को बौना बना देता है। प्रेम में समर्पित हो जाना शायद व्यक्ति की अहमियत कम कर देता है और शायद ये बात हर उस शख्स के साथ है जो प्रेम मे समर्पित है।

मैं हमेशा मित्रता पर ही जोर देती रहती थी। एक अच्छे मित्र के होने के नाते बहुत खुलकर बात कर लेते थे हम दोनों। अपनी कई परेशानियां भी एक दूसरे से शेयर कर कर लेते थे। मेरा मानना था प्रणय निवेदन स्वीकार करने के बाद रिश्ते में ठहराव आ जाता है और व्यक्ति की अहमियत खत्म हो जाती है। कहीं ऐसा ना हो कि वक्त के साथ हमें लगने लगे कि हम एक दूसरे के लिए बोझ बन रहे हैं। दोस्ती में हमेशा एक नयापन सा रहता है मिलने का जज्बा रहता है। जब भी बात करिए एक खुशनुमा स्वस्थ माहौल और स्वस्थ मानसिकता बनी रहती है जो रिश्ते को टिकाने के लिए जरूरी होती है। साथ ही रिश्ते को मजबूती भी देती है। मैं जानती थी कि मेरे जरा सी ढील देने पर महेश अपना पूरा प्रेम भी बिखेर सकता है मगर कहीं पर बंधन बहुत जरूरी होते हैं। एक नया रिश्ता बनाने के बजाय पुराने रिश्ते को बचाने के लिए।



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