अब हिंदुस्तान से पड़ा है कोरोना का पाला 
| -RN. Feature Desk - Mar 23 2020 12:17PM

कोरोना का पाला अब हिंदुस्तान से पड़ा है और अब उसको हर हाल में हिंदुस्तान से भागना ही पड़ेगा। जनता कर्फ्यू के दौरान जो एंटी कोरोना पच्चीस परसेंट एक्स्ट्रा की जो बातें नजर आ रही है उससे कोरोना दुम दबाकर भागने के लिए मजबूर होता दिखाई पड़ रहा है। जनता कर्फ्यू के दौरान घर से बाहर निकलने की बात तो बहुत दूर हम तो पूरे दिन भर अपने पलंग से ही बाहर नहीं निकल पाए। चारों हाथ-पैरों को दसों दिशाओं में फैला कर कोरोना की याद में इस तरह से आहें भरने लगे जैसे नेता अपनी कुर्सी की याद में और इमरान खान अपने भिखारीपने की याद में आहें भरता है। घनघोर आलसी बनकर पंलग के इस कोने से उस कोने तक घिसटते ही रहे। घर में पड़कर आलसी होना कितना फायदेमंद रहता है, यह आज ही सीखने को मिला। जो जितना ज्यादा आलसी वही कोरोना के गले में फांसी का फंदा डालसी। पलंग उवाच- 'बस यूं ही पहलू में बैठे रहो, आज जाने की जिद न करो।

अपने प्रिय आलस से बतियाते रहो। घर में ही पड़े रहो और कोरोना की नाक में दम भरते रहो।' आलस्य व्यक्ति को बुरे काम करने से भी रोकता है। जब किसी का बुरा सोचते हैं, नुकसान करने की सोचते हैं, तब आलस ही मुस्कराते हुए मना कर देता है। करोना कथा का सार है- 'आलस करो ना, घर में परिवार संग रहो ना। इधर-उधर बंदर गुलांटी मत भरो ना।' शोध सार है कि आलस्य के चलते मृत्युदंड पा चुके व्यक्ति भी जीवन दान के लाभार्थी रूप में परिणीत हो जाते हैं! न्यूटन का जड़त्व का सिद्धांत भी मूलतः आलस्य पर ही आधारित है, पड़े तो पड़े ही रहो, जब तक की कोई सरकार लॉकडाउन का शटर न उठा दे। पता है न न्यूटन ने घर में पड़े-पड़े ही बगीचे में पेड़ से सेब गिरते देखा और गुरुत्वाकर्षण की खोज कर डाली। जय हो 'स्टे होम' महाराज की!

घर में साफ सफाई की इतनी घचाघच मची है की सबसे पहले हम साबुन से सैनिटाइजर को धोते हैं। फिर सैनिटाइजर से साबुन को धोने का कार्यक्रम किया जाता है। बाद में फिर इस तथाकथित साबुन से ही हमारे हाथ धोने का कार्यक्रम होने लगा है। एंटी कोरोना की एक्स्ट्रा एक्टिविटी से हमने इतनी बार हाथ थो डाले कि हमारी हाथों की रेखा धुल-धुलाकर भागती हुई नाली में बहकर धरती माता में विलीन हो गई। इन्हें हम तकदीर की रेखाएं कहें या फिर परेशानी की रेखाएं कहें, सब मिट गई। हाथ की सारी रेखाएं बार-बार धुलाई के कार्यक्रम से सिमट गई। अब न रही हस्तरेखा और न ही रहे उसके विशेषज्ञ! कोरोना के जनता कर्फ्यू का एक्स्ट्रा बाउंस तब आया जब नहाते समय भी हमने मुंह से मास्क नहीं हटाया।

मुंह और उसमें लटके नाक को हरदम पूरे मास्क में लपेट कर ही खाना खाया। अब खाना खाते समय भी मास्क कौन हटाए? परम आलसी जीव हैं, मलूकदास के अनुचर- 'अजगर करे न चाकरी, पंछी करे ना काम। कोरोना आ जाएगा, घर में ही करो आराम।' जरा इसे भी समझिए कोरोना काल में- 'ये दुनिया बड़ी तेज चलती है। बस जीने के लिए ही मरती है। चल-चलकर जाने कहां पहुंचेगी, वहां चलकर भी क्या कर लेगी।' कोरोना सिद्धांत भी सामने आ गया है, जो चलना बंद करता है आखिर में वही बच पाता है। जो सबसे ज्यादा आलसी बनकर घर में ही पड़ा रहता है। वही दुनिया जीत पाता है। क्या खयाल है आपका? पड़े रहेंगे ना घर पर? कुछ दिन और जनता कर्फ्यू फरमाइए मेरे हुजूर!

-रामविलास जांगिड़, 18, उत्तम नगर, घूघरा, अजमेर (305023) राजस्थान



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