मात्र तीन माह में ध्वस्त होते, घोर भ्रष्टाचार के शिकार राष्ट्रीय राजमार्ग
| -RN. Feature Desk - Nov 12 2020 12:21PM

-निर्मल रानी

                           भारतीय तंत्र व्यवस्था व  भ्रष्टाचार का तो गोया चोली दामन का साथ है। हमारी शासनिक अथवा प्रशासनिक किसी भी व्यवस्था का कोई भी ऐसा तंत्र नहीं है जो गर्व से यह कह सके कि हमारे वर्ग अथवा विभाग का कोई भी व्यक्ति आज तक भ्रष्टाचार में लिप्त नहीं पाया गया। परन्तु 2014 के बाद भ्रष्टाचार के विरुद्ध हल्ला बोलते हुए जिस तरह दिल्ली दरबार में मोदी सरकार ने सत्ता संभाली और भ्रष्टाचार पर ज़ीरो टोलरेंस की बात की जाने लगी उस समय से देश के आम लोगों में यह उम्मीद ज़रूर जगी थी कि देश की जड़ों तक अपनी पैठ गहरी कर चुका भ्रष्टाचार यदि पूरी तरह से ख़त्म नहीं भी हुआ तो नियंत्रित तो ज़रूर हो जाएगा।

                             और जब प्रधानमंत्री ने सार्वजनिक मंच से देशवासियों को यह आश्वासन दिलाया कि 'न खाऊंगा न खाने दूंगा' तब तो पूरे देश को यह यक़ीन ही हो गया कि अब देश से न केवल भ्रष्टाचार समाप्त होने वाला है बल्कि अब भ्रष्टाचारियों की भी ख़ैर नहीं। परन्तु ठीक इसके विपरीत भ्रष्टाचार को लेकर ही मोदी सरकार को विपक्ष के ऐसे अनेक हमलों का सामना करना पड़ा जिसने भ्रष्टाचार के पिछली यू पी ए सरकारों के भी सारे रिकार्ड तोड़ दिए। कभी राफ़ेल विमान ख़रीद को लेकर विपक्ष ने सवाल खड़े किये तो कभी व्यापम भर्ती जैसा हत्या व भ्रष्टाचार से लिप्त घोटाला सामने आया।प्रधानमंत्री ने स्वयं को 'देश का चौकीदार' बताया तो विपक्ष ने आरोप लगाया की 'चौकीदार चोर है'।कभी चंद बड़े व्यवसायी देश के ग़रीबों व कर दाताओं के ख़ून पसीने की कमाई लूटकर देश छोड़कर विदेशों में जा बसे तो कुछ बड़े व्यवसायी सत्ता से मधुर संबंधों का लाभ उठाते हुए हवाई अड्डे,रेलवे स्टेशन व अन्य कई सरकारी उद्यम व प्रतिष्ठान ख़रीदते नज़र आने लगे।

                                                       ऐसा लगता है कि तमाम भारतीय निर्माण उद्योगों ने भी उच्च कोटि के इन सरकारी संरक्षण प्राप्त व्यवसायियों से सीख लेते हुए ख़ुद भी उसी राह पर चलना शुरू कर दिया है। वैसे तो हमेशा से ही भारत में होने वाले सरकारी विकास व निर्माण कार्य मंत्रियों से लेकर संतरियों तक के घोर भ्रष्टाचार व धन संग्रह का एक प्रमुख साधन रहे हैं। देश में जहाँ कहीं भी सड़कों पर गड्ढे नज़र आएं या गली मोहल्लों की सड़कें या नाले नालियां टूटी हों,स्टेशन के प्लेटफ़ॉर्म टूटे-फूटे नज़र आएं,चौक-चौराहे,पार्क,सरकारी फ़व्वारे आदि दुर्व्यवस्था का शिकार हों तो आप आँखें मूँद कर इस बात का विश्वास कर सकते हैं कि यह हालात भ्रष्टाचार के कारण ही पैदा हुए हैं। कहीं सरकारी भवन समय से पहले क्षति ग्रस्त हो जाते हैं तो कहीं नदियों के किनारे बनने वाले बांध तैयार होने से पूर्व ही बाढ़ के पानी में बह जाते हैं। परन्तु भ्रष्ट व्यवस्था यह सब आँखें मूंद कर देखती रहती है। इसी प्रकार महंगी से महंगी मशीनें सरकारी उपयोग हेतु ख़रीदी जाती हैं। इसके बाद या तो कहीं यह मशीनें ऑपरेटर न होने की वजह से चल नहीं पातीं या ख़राब होने पर रिपेयर नहीं हो पातीं। नतीजतन सरकार को करोड़ों रुपयों का चूना लग जाता है।

                                                   अब तो इन्तहा यह हो गयी है कि सैकड़ों करोड़ रुपयों की लागत से तैयार होने वाले नेशनल हाई वे जिनपर सीमेंटेड सड़कों का जाल बिछाया गया है उनकी उम्र मात्र तीन-चार महीने की होने लगी है। इसतरह के बड़े भ्रष्टाचार का ताज़ा उदाहरण चंडीगढ़ से वाया अम्बाला होकर जाने वाला हिसार-कैथल बाई पास है। गत वर्ष यानी नवंबर-दिसंबर2019 में यह 6 लेन का सीमेंटेड राजमार्ग वाहनों के लिए खोला गया। यह मार्ग अम्बाला शहर को बाई पास करते हुए दो जगह रेलवे लाइन के ऊपर से गुज़रता है तो दो जगह मुख्य राजमार्गों के ऊपर से। बाई पास शुरू होने के तीन माह के भीतर ही राजमार्ग में इन चारों ही पुलों के समीप दरार पड़नी शुरू हो गयी थी। जो दिन प्रति दिन इतने गहरे गड्ढे में बदल गयी की किसी भी समय किसी बड़े हादसे को दावत दे सकती थी। आज इस मार्ग का काफ़ी बड़ा भाग पूरी तरह क्षति ग्रस्त हो चुका है। कई जगह कंपनियों ने भ्रष्टाचार के अपने काले करतूतों को छुपाने के लिए सीमेंट की दरारों को तारकोल के जोड़ से ढकने का काम किया है जो कि पूरी तरह काम चलाऊ और केवल ऐब को छिपाने वाला है न कि सड़क को मज़बूती देने वाला।

                                                         यह हाईवे बाईपास पिछले दिनों दिल्ली-अमृतसर रेल लाइन को पर करने वाले पुल के समीप आख़िर कार बुरी तरह से धंस गया। और अपनी शुरुआत के एक वर्ष भी पूरा न करते हुए इसे मरम्मत हेतु तोड़ दिया गया। इन दिनों इस मार्ग को एक तरफ़ से ही खोल कर रखा गया है और लगभग दो किलोमीटर का भाग एक तरफ़ा मार्ग के रूप में प्रयोग हो रहा है। ज्ञात हुआ है कि यह मार्ग जिस कंपनी द्वारा निर्मित क्या गया है वह ऊँचे रसूक़ रखने वाले किसी बड़े नेता के संबंधी की कंम्पनी है। जहाँ तक भ्रष्टाचार को लेकर 'न खाऊंगा न खाने दूंगा' का दंभ भरने वाली सरकार व भ्रष्टाचारियों के बुलंद हौसलों का प्रश्न है तो वह भी एक स्वाभाविक सी प्रवृति बनती जा रही है। क्योंकि जब बिहार में पिछले दिनों हुए विधानसभा चुनावों से ठीक पहले दो दो बड़े पुल एक उदघाटन के कुछ ही घंटों के बाद और एक उदघाटन से कुछ ही घंटों पहले ध्वस्त हो गए और कमज़ोर होने की वजह से नदी में बह गए उसके बाद भी यह मुद्दा कहीं भी विपक्ष द्वारा उठता नहीं दिखाई दिया। बल्कि नितीश कुमार को पुनः निर्वाचित कर लिया गया। आज देश की जनता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से भी नहीं पूछती कि कहाँ गया 'न खाऊंगा न खाने दूंगा' जैसा लोकलुभावन नारा ? ठीक इसके विपरीत भ्रष्टाचार व भ्रष्टाचारियों की जय जय कार होती दिखाई दे रही है। ऐसे में इस बात पर भी क्या संदेह किया जाए की आने वाले समय में भ्रष्टाचार के विरुद्ध आवाज़ उठाने वाला व्यक्ति ही पूर्वाग्रही,राष्ट्र विरोधी,असामान्य,मानसिक रोगी या कुछ और कहा जाने लगे?और भ्रष्टाचारियों के हौसले भविष्य में इतने बुलंद होने लगें कि ऐसे राजमार्गों या अन्य सरकारी निर्माणों की संचालन अवधि मात्र दो तीन महीने की ही रह जाए?



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