प्ली बारगेनिंग एवं बन्दियों को विभिन्न नियमों के द्वारा रिहाई के सम्बन्ध में विधिक साक्षरता शिविर का आयोजन
| -RN. News Desk - Nov 24 2020 4:23PM

अम्बेडकरनगर। उ0प्र0 राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण, लखनऊ द्वारा प्रेषित प्लॉन आफ एक्शन 2020-21 के अनुपालन में डॉ0 बब्बू सारंग, जनपद न्यायाधीश/अध्यक्ष, जिला विधिक सेवा प्राधिकरण, अम्बेडकरनगर के निर्देशानुसार दिनांक 24.11.2020 को 01.00 बजे से जिला कारागार, अम्बेडकरनगर में प्ली बारगेनिंग एवं बन्दियों को विभिन्न नियमों के द्वारा रिहाई के सम्बन्ध में विधिक साक्षरता शिविर का आयोजन किया गया।

    शिविर को सम्बोधित करते हुये अशोक कुमार, प्रभारी सचिव, जिला विधिक सेवा प्राधिकरण, अम्बेडकरनगर ने प्ली बारगेनिंग विषय पर बोलते हुये कहा कि भारतीय संसद ने दण्ड प्रक्रिया संहिता में संशोधन अधिनियम 2/2006 द्वारा एक नया अध्याय 21(ए) (धारा 265-ए से 265-एल) प्ली बारगेनिंग नामक शीर्षक जोड़कर दांडिक अभियोजन व पीड़ित पक्ष आपसी सामंजस्य से प्रकरण के निपटारे हेतु न्यायालय के अनुमोदन से एक रास्ता निकालते हैं जिसके तहत अभियुक्त द्वारा अपराध स्वीकृति पर उसे हल्के दण्ड से दण्डित किया जाता है जो अन्यथा कठोर हो सकता है। प्ली बारगेनिंग समझौते का एक तरीका है। इसके तहत अभियुक्त कम सजा के बदले में अपने द्वारा किये गये अपराध को स्वीकार करके और पीड़ित व्यक्ति को हुये नुकसान और मुकदमें के दौरान हुये खर्चे की क्षतिपूर्ति करके कठोर सजा से बच सकता है। 

       प्ली बारगेनिंग केवल उन अपराधों पर लागू होता है जिनके लिये कानून में सात वर्ष तक सजा का प्राविधान है। यदि अभियुक्त उसी अपराध में पूर्व में सिद्धदोष हुआ हो तो वह प्ली बारगेनिंग के लिये अयोग्य होगा। आवेदन प्राप्त होने के पश्चात न्यायालय लोक अभियोजक पीड़ित एवं अनुसंधानकर्ता अधिकारी को न्यायालय में उपस्थित रहने के लिये नोटिस जारी करेगा। न्यायालय उक्त पक्षों को आपसी संतोषजनक हल निकालने के लिये समय देगा। इसके अतिरिक्त 436ए के बारे में बताया कि जब किसी व्यक्ति किसी विधि के अधीन किसी अपराध के (मृत्यु दण्ड को छोड़कर) इस संहित के अधीन अन्वेषण, जांच या विचारण की अवधि के दौरान कारावास की उस अधिकतम अवधि के, जो उस विधि के अधीन उस अपराध के लिए विनिर्दिष्ट की गई है, के आधे से अधिक के लिए कारागार निरूद्ध रह चुका है। 

        कार्यक्रम को सम्बोधित करते हुये श्रीमती हंसिका मिश्र, जेल अधीक्षक, जिला कारागार, अम्बेडकरनगर ने कहा कि माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा ऐसी व्यवस्था दी है कि उन विचाराधीन आरोपियों को तुरंत रिहा किया जाये जिन्होने अपने ऊपर लगे अभियोग की संभावित अधिकतम सजा का आधा समय बतौर आरोपी जेल में व्यतीत कर लिया है। न्यायालय ने यह भी निर्देश दिया है कि जिला विधिक सेवा प्राधिकरण से सम्बन्धित अधिकारी अपने अधिकार क्षेत्र में प्रत्येक कारावास पर जाकर इस प्रकार के कैदियों कि रिहाई के लिये आवश्यक प्रक्रिया कि निगरानी करेंगे। इन आदेशों से लंबी अवधि से जेलों में बंद विचाराधीन कैदी रिहा हो सकेंगे। इस परिप्रेक्ष्य में माननीय उच्चतम न्यायालय का फैसला स्वागत योग्य 

    रमाकान्त दोहरे, जेलर, जिला कारागार, अम्बेडकरनगर ने बताया कि विचाराधीन कैदियों की संख्या को कम करने के उद्देश्य से वर्ष 2006 में दण्ड प्रक्रिया संहिता में एक महत्वपूर्ण संशोधन करके प्ली बारगेनिंग का नया अध्याय जोड़ा गया। इसके तहत सात साल तक की सजा के मामले में आपसी सहमति से मुकदमों का निपटारा करने का विकल्प प्रदान किया गया है, अभियुक्त अपना अपराध स्वीकार करने के एवज में सजा में आधी से अधिक छूट प्राप्त करके रिहा हो सकता है। धारा 436ए में ऐसे कैदियों को जो अपनी सजा का आधा समय कैद में व्यतीत कर चुके हैं व जिनकी कोई जमानत देने वाला नहीं है उन्हे निजी मुचलके पर रिहा किये जाने का प्राविधान है एवं धारा 167(2) व 437(6) के तहत विचाराधीन कैदियों को रिहा करने का प्राविधान है। इस शिविर में देवनाथ यादव, उपकारापाल, प्रदीप, फिरोज तथा जिला कारागार के कर्मचारीगण आदि उपस्थित थे।    



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