मानवता व शिक्षा के प्रति समर्पित महान व्यक्तित्व के स्वामी थे डा० क्लब-ए-सादिक़ 
| -RN. Feature Desk - Nov 25 2020 2:35PM

-निर्मल रानी

                                           प्रायः लगभग सभी धर्मों,जातियों व समुदायों में अनेकानेक ऐसे धर्म गुरुओं का वर्चस्व देखा जा सकता है जो अपने ही समुदाय विशेष के मध्य अपने प्रवचनों ,सामुदायिक व धार्मिक कार्यकलापों के द्वारा लोकप्रियता हासिल करते रहे हैं।आमतौर पर धर्म गुरुओं की लोकप्रियता का पैमाना इस बात पर भी निर्धारित होता है कि कोई धर्मगुरु अपने समाज के लोगों को ख़ुश करने या उन्हें ऐसा सन्देश देने में कितना सफल होता है जोकि समाज विशेष सुनना चाहता है। मिसाल के तौर पर वर्तमान राजनैतिक व सामाजिक संदर्भ में ही यदि देखें तो दुर्भाग्यवश यदि कोई अतिवादी हिंदूवादी, इस्लाम या मुस्लिम विरोधी बातें करता है या कोई कट्टरपंथी मुस्लिम वक्ता ग़ैर मुस्लिमों के विरुद्ध अपना राग अलापता है अथवा शिया-सुन्नी समाज के धर्मगुरु एक दूसरे समुदाय के विरुद्ध तक़रीरें करते हैं अथवा उनकी मान्यताओं या विश्वास के विरुद्ध अपनी भड़ास निकलते हैं,ऐसे लोग अपने अपने समाज में कुछ ज़्यादा ही पसंद किये जाते हैं। गोया कहा जा सकता है कि वर्तमान सामाजिक व्यवस्था में अतिवादी सोच-विचार  रखने वाले नेताओं या तथा कथित धर्म गुरुओं का ही बोलबाला है।

                                            परन्तु यदि इसी संकटकालीन व अंधकारमय वातावरण में कोई ऐसा धर्मगुरु नज़र आ जाए जो स्वयं को हिन्दू-मुस्लिम-शिया-सुन्नी-सिख-या ईसाई कहलवाने के बजाए केवल एक अच्छे इंसान के रूप में अपनी पहचान को प्राथमिकता दे,तो निश्चित रूप से उस व्यक्तित्व का नाम था डाक्टर क्लब-ए-सादिक़ ही हो सकता है । 81 वर्षीय डाक्टर क्लब-ए-सादिक़ साहब के निधन से देश ने सर्वधर्म संभाव तथा राष्ट्रीय एकता का अलंबरदार खो दिया है। यह एक ऐसा नुक़सान है जिसकी भरपाई नहीं की जा सकती। बेशक डाक्टर क्लब-ए-सादिक़ साहब का जन्म उत्तर प्रदेश में जायस से संबंध रखने वाले एक उच्च कोटि के शिया घराने में हुआ था। परन्तु स्वयं डॉक्टरेट की डिग्री धारण करने वाले डॉ सादिक़ साहब ने अपनी युवा अवस्था में ही धर्म व समाज दोनों ही तरफ़ से यह ज्ञान हासिल कर लिया था कि मानवता,सर्वधर्म सद्भाव तथा शिक्षा से बढ़कर समाज व संसार में कुछ भी नहीं। धार्मिक व जातीय विवादों को तो वे हमेशा से ही निरर्थक विवाद मानते रहे।
                                             पूरा देश जानता है कि लखनऊ, शिया-सुन्नी विवाद का एक ऐसा केंद्र रहा है जहाँ प्रायः दोनों समुदायों में ख़ूनी खेल खेले जाते रहे हैं। दोनों पक्षों के सैकड़ों लोग इसी फ़साद की भेंट चढ़ चुके और सैकड़ों घर व दुकानें इन्हीं दंगों में आग के हवाले हो चुकीं। परन्तु इसी शिया सुन्नी तनाव वाले शहर में शिया-सुन्नी की संयुक्त नमाज़ का सिलसिला शुरू करवाने जैसा असंभव कार्य कर दिखाने वाले शख़्स डाक्टर क्लब-ए-सादिक़ साहब ही थे। वे केवल शिया सुन्नी एकता के ही नहीं बल्कि सभी धर्मों में परस्पर एकता के बहुत बड़े पक्षधर थे। लखनऊ में डाक्टर साहब कभी किसी हिन्दू समुदाय के भंडारों में शरीक होते,लंगर खाते व अपने हाथों से लंगर बांटते देखे जाते तो कभी किसी गुरद्वारे की अरदास व शब्द कीर्तन में हाज़िर होते नज़र आते। कभी किसी चर्च में हाज़िरी देते तो कभी किसी हिन्दू या जैन मंदिर के कार्यक्रमों में पूरी श्रद्धा व सम्मान के साथ शरीक होते।
                                              डाक्टर क्लब-ए-सादिक़ साहब के जीवन का सबसे बड़ा लक्ष्य यही था कि समाज का हर व्यक्ति शिक्षित बने। विशेषकर ग़रीब बच्चों व कन्याओं की शिक्षा पर वे अधिक ज़ोर देते थे। लखनऊ में इनके संरक्षण में स्थापित व संचालित हो रहे यूनिटी कॉलेज व एरा मेडिकल कॉलेज स्व डाक्टर साहब के सपनों को साकार करने वाले संस्थान हैं।वे अपने लेक्चर्स में हमेशा सर्वसमाज को जोड़ने व उनके उनके परस्पर हितों की बात करते थे। यू ट्यूब पर उनके अनेक ऐसे प्रवचन सुने जा सकते हैं जिसमें वे बेलाग लपेट के अपनी बातें कह रहे हैं। वे इस बात को भी शिद्दत से स्वीकार करते थे कि अज्ञानी व स्वार्थी पंडितों व मौलवियों ने ही केवल अपने स्वार्थ वश धर्म को कलंकित करने का कार्य किया है। वे समाज को ऐसे स्वार्थी व अर्धज्ञानी तत्वों से सचेत रहने की हिदायत देते रहते थे। उनका मानना था कि केवल शिक्षा ही किसी भी मनुष्य के जीवन को सफल व आत्मनिर्भर बना सकती है। मानवता को धार्मिक कारगुज़ारियों से भी बड़ा बताने वाला उनका एक उद्धरण बहुत ही मशहूर है। इसमें उन्होंने बताया कि यदि कोई मुसलमान व्यक्ति अपने घर से नहा धोकर, पवित्र होकर हज के लिए जा रहा है और रास्ते  कोई व्यक्ति नदी में डूब रहा है और डूबते समय वह व्यक्ति हे राम हे राम भी कह रहा है,इससे यह तो स्पष्ट है कि डूब रहा व्यक्ति हिन्दू है। और उसके डूबने का दृश्य देखने वाला यानी हज पर जाने वाला व्यक्ति मुसलमान। स्व डाक्टर साहब के अनुसार,ऐसे में इस्लाम धर्म का भी यही तक़ाज़ा है कि उस मुसलमान व्यक्ति का कर्तव्य व उसका धर्म यही है कि हज को छोड़ कर पहले डूबते व्यक्ति की जान बचाई जाए भले ही डूबने वाला व्यक्ति हिन्दू ही क्यों न हो और भले ही बचाने वाले मुसलमान व्यक्ति का हज छूट ही क्यों न जाए। इस प्रकार के उद्धरण प्रस्तुत कर वे हमेशा समाज से धर्म आधारित नफ़रत दूर करने व धार्मिक सद्भाव पैदा करने तथा मानवता को सर्वोपरि बताने की कोशिशें करते थे।
                                             सभी धर्मों को सामान रूप से सम्मान देना,सब में समान रूप से शिक्षा की अलख जगाना,ग़रीबों की शिक्षा पर विशेष ध्यान देना,विवादित विषयों व सन्दर्भों से किनारा रखना उनकी विशेषताएं थीं। शिया समाज के मध्य पढ़ी जाने वाली उनकी मजलिसें भी ज्ञान वर्धक,तार्किक व वैज्ञानिक विचार प्रस्तुत करने तथा समाज के सभी वर्गों के लिए सुनने व समझने वाली होती थीं। उनके लेक्चर्स पूरी दुनिया में पसंद किये जाते थे। उन्होंने दर्जनों देशों की यात्राएं कीं तथा हर जगह एकता व सद्भाव का सन्देश दिया। शिया सुन्नी के विषय में वे कहते थे कि शिया सुन्नी आपस में भाई नहीं बल्कि एक दूसरे की 'जान' हैं। ऐसे शब्दों के प्रयोग से वे समाज में सद्भाव पैदा करने व नफ़रत दूर करने की कोशिश करते थे। हिन्दू समाज में भी संत मुरारी बापू,आचार्य प्रमोद कृष्णन व स्वामी नारंग जैसे कई धर्मगुरु हैं जो निरंतर समाज को जोड़ने के प्रयास में लगे रहते हैं। परन्तु महान धर्मगुरु डा० क्लब-ए-सादिक़ के साकेत वास के बाद निश्चित रूप से इस्लाम धर्म में भारत में ही नहीं बल्कि पूरे विश्व में ऐसे महान शिक्षावादी,शिक्षाविद,मानवतावादी,राष्ट्रीय एकता तथा सर्वधर्म संभाव के ध्वजावाहक की कमी हमेशा महसूस की जाएगी।



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