अफसर गेट खोलता ही नहीं
| -RN. Feature Desk - Jan 21 2021 1:03PM

-रामविलास जांगिड़

अफसर बैठा है और मजे से बैठा है। अंदर अकेला अफसर और बाहर भारी भरकम भीड़! मिलने के लिए आतुर! मैं बाहर प्रतीक्षा कर रहा हूं। मेरे गरीब होने के प्रमाण पत्र पर अफसर की चिड़िया बैठानी है। पिछले 3 घंटे से मिलने की कोशिश में हूं ताकि मान्यता प्राप्त गरीब बन सकूं। हालांकि मिलने के बाद मेरे गरीब बनने संबंधी काम होगा या नहीं! यह तो भविष्य के गर्भ, अफसर के दिमागी हालात और मेरी जेब में रखे रुपयों पर निर्भर है। कागजों में गरीब बनने के लिए मिलना जरूरी है।

एक कागज पर अफसर के हस्ताक्षर उर्फ उनकी चिड़िया बैठाना ही है मेरी जिंदगी का मकसद। शास्त्रों में कहा गया है कि अफसर से मिलना और ऊंट को मोटर में बिठाने के समान होता है। ऊंट को मोटर गाड़ी में बिठाया भी जा सकता है, लेकिन अफसर से मिलना बहुत मुश्किल! सौ प्याज और सौ जूते खाने के बाद भी मिलना मुश्किल!

अफसर के ऑफिस के बाहर इधर-उधर घूम रहा हूं। बार-बार एक खिड़की की झिर्री से अंदर झांक भी रहा हूं। लेकिन अफसर है कि जाने कौन सी फाइल में घुसा पड़ा है। जाने कौन से चैटिंग ऐप में गोते लगा रहा है। दरवाजा बंद है। अंदर जाने क्या पक रहा है, या कोई दलाल बैठा है, या कोई चमचा दाल हिला रहा है! जाने क्या हो रहा है! अफसर चेंबर कुटीर में पड़ा आराम फरमा रहा है। वह फोन पर बतिया रहा है।

फिर किसी मातहत को गरिया रहा है। मैं मिलने के लिए बाहर बरामदे में बैठा हूं। गरीब बनने के लिए आतुर! मेरे जैसे कई लोग घूम रहे हैं। लंबी कतार है। कई तो गांव जाने की चिंता में गठरी भी बन गए हैं। गांव जाने वाली आखरी बस होर्न मार चुकी है। चिंता खाए जा रही है कि रात गांव कैसे जाया जाएगा? लेकिन इधर अफसर से मिलना भी जरूरी है। गांव जाना तो दूर पेशाब करने के लिए भी नहीं जा सकते। कई हाथ आपस में जुड़े हुए कड़क हो गए हैं। कई-कई घंटों से बैठे हैं। कातर चेहरे के लातर हाथ!

हाथ आपस में जुड़ गए हैं। शायद ऑपरेशन से भी अलग होंगे कि नहीं। पेशाब रुका पड़ा है। सब कह रहे हैं। पेशाब करने के चक्कर में उलझ मत जाना। इधर पेशाब करने गए नहीं कि उधर से अफसर निकल गया तो! पेशाब तो किया किया, नहीं किया! लेकिन अफसर से नहीं मिला तो जिंदगी बर्बाद हो जाएगी! यही तो होगा ना किडनी खराब हो जाएगी।

वैसे भी गरीब की किडनी का क्या मोल! पेशाब के दौरान अफसर निकल लिया तो फिर हो गई ऐसी-तैसी! पूरा दिन, महीना तो क्या! पूरी जिंदगी खराब हो जाएगी। पेशाब रुक गया है। सांसे रुक गई है। नजर सिर्फ अफसर के गेट पर टिक गई है। अंदर से हंसी के फव्वारे छूट रहे हैं। बाहर मायूसी पसरी पड़ी है गैलरी में। अफसर है कि गेट खोलता ही नहीं। गेट पर टिका चपरासी जाने कुछ बोलता ही नहीं। जाने कौन सी दुनिया में बहुत बिजी है अफसर!



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