चुनावी जंग जारी यू पी सब पर भारी
| -RN. Feature Desk - Feb 12 2021 12:44PM

-रिजवान चंचल 

बताते चलें कि तृणमूल कांग्रेस ने वर्षों से यहां पर शासन करने वाली लेफ्ट सरकार को हराकर सत्ता हासिल की थी ऐसे में सत्ता  को बरकरार रखने के लिए ममता दीदी भी दिनरात एक किये हुए हैं वहीं दूसरी और भाजपा येन-केन प्रकारेण इस बार यहाँ सत्ता पर काबिज होने का पुख्ता इरादा बनाये हुए है मगर यूपी की सियासत  सर्दी के मौसम में ही गरम हो चली है यहाँ इस बार आम आदमी पार्टी और ओवैसी की पार्टी ने चुनाव लड़ने का ऐलान क्या कर दिया राजनीतिक सरगर्मी हिलकोरें मारने लगी!

ओवैसी ने पिछले दिनों लखनऊ पहुंचकर यूपी के कुछ खास जिलों में अपना असर रखने वाली पार्टी सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के अध्यक्ष ओमप्रकाश राजभर से भी मुलाकात की है। मालूम हो कि 2017 के चुनाव में ओमप्रकाश राजभर की पार्टी बीजेपी के साथ मिलकर चुनाव लड़ी थी। राजभर योगी सरकार में मंत्री भी बने थे लेकिन 2019 के चुनाव के वक्त इस पार्टी ने अपना रास्ता अलग कर लिया था इधर आम आदमी पार्टी ने भी यूपी में अपनी राजनीतिक सरगर्मी तेज कर दी है।

संजय सिंह सहित दिल्ली के उप मुख्यमंत्री मनीष सिसौदिया भी यहाँ दौरा कर चुके हैं और अब बिहार में असर रखने वाली दो पार्टियों-जेडीयू और लोक जनशक्ति पार्टी के स्थानीय नेताओं ने 2022 में अपने उम्मीदवार उतारने की बातकर यहाँ के सियासी गुणाभाग को सरगर्मी देते हुए आगामी होने वाले चुनाव को खासी हवा दे दी है। इसमें कोई दो राय नहीं जातिवाद और क्षेत्रवाद के मुद्दे को लेकर यूपी में कई छोटी-छोटी पार्टियों का अपने-अपने क्षेत्र के मतदाताओं में खासा दखल है ये क्षेत्रीय पार्टियाँ खुद तो अकेले दम पर कम चुनाव जीतती है पर किसी भी बड़े दल के प्रत्याशी की हार और जीत में इनकी बड़ी भूमिका होती है।

यूपी में मुख्य विपक्षी पार्टी के रूप में भाजपा को चुनौती देने वाली समाजवादी पार्टी के सुप्रीमो अखिलेश यादव ने पिछले दिनों यह जरूर कहा कि वे किसी बड़े दल के साथ गठबंधन नहीं करेंगे और अपने दम पर चुनाव लड़ेंगे लेकिन साथ ही वह यह भी कह गए कि छोटे दलों के साथ वो चलना पसंद करेंगे कुछ क्षेत्रीय दलों के लोग अखिलेश यादव के साथ सक्रिय भी हैं। उत्त र प्रदेश में छोटे दलों का सबसे प्रभावी असर विधानसभा चुनाव 2017 में देखने को मिला, जब राष्ट्री य और राज्यभ स्तरीय दलों के अलावा करीब 290 पंजीकृत दलों ने अपने उम्मीसदवार उतारे थे। विधानसभा चुनाव 2012 में भी करीब 200 पंजीकृत दलों के उम्मीदवारों ने अपनी किस्मत आजमाई थी।

राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है अब दौर बदल रहा है। जाति आधारित, क्षेत्रवाद पर बनी छोटी पार्टियां अब राजनीति में एक बड़ी जरुरत बन गई है।  पीस पार्टी, आजाद समाज पार्टी, भीम आर्मी, जनसत्ता पार्टी, अपना दल (एस), निषाद पार्टी के साथ असदुदीन ओवैसी की पार्टी आल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुसलमीन भी चुनावी बिसात के चौसर बिछा रही हैं। भारतीय जनता पार्टी का सबका साथ-सबका विकास को ’मूल मंत्र मानकर चल रही हैं वह इसी के आधार पर छोटे दलों को सम्मानपूर्वक भागीदारी देने के रस्ते पर है भाजपा नेताओं का मानना है की गठबंधन के सभी दलों से उनके मजबूत रिश्ते हैं जो आगे और भी मजबूत ही रहेगे।

2017 के विधानसभा चुनाव और उसके बाद 2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने एसपी और बीएसपी, जिन्हें राज्य की दो सबसे बड़ी पार्टियां माना जाता रहा है, उन्हें बौना साबित कर दिया था सपा से भी गयी गुजरी बीएसपी की स्थिति रही है ! विधानसभा के चुनाव में बसपा जहां केवल 19 सीट जीत पाई थी, वहीं लोकसभा के चुनाव में 10 सीटों तक ही सिमट कर रह गयी! ऐसे कयास भी लगाए जा रहें हैं की ओवैसी यूपी में बीएसपी से गठबंधन कर सकते हैं लेकिन  क्या बसपा सुप्रीमों ऐसा करेगी यह अभी भविष्य के गर्त में है । बिहार में बीएसपी के साथ ओवैसी की पार्टी गठबंधन का हिस्सा थी लेकिन बिहार में बीएसपी भले ही छोटी पार्टियों के साथ गठबंधन का हिस्सा बनने को राजी हो गई हो यूपी में ऐसा मुश्किल ही लगता है।

दूसरी तरफ आम आदमी पार्टी ने यूपी में चुनाव लड़ने का जो ऐलान किया है, उसकी वजह चुनाव दर चुनाव कांग्रेस हो या बसपा इनके कमजोर होने से जो स्पेस खाली हुआ है, उस पर वह काबिज होने का मौका देख रही है। यूपी में अपर कास्ट का एक हिस्सा ऐसा भी माना जाता है जो न ही बीजेपी और न ही एसपी-बीएसपी बोट करना पसंद करता हैं यह वोट कांग्रेस के साथ जाता रहा है।आम आदमी पार्टी को लग रहा है की कांग्रेस के इस वोट बैंक को अपने पाले में शिफ्ट किया जा सकता है इसी के मद्देनजर आम आदमी पार्टी राज्य में खुद को अपर कास्ट की पार्टी के रूप में पेश भी कर रही है शायद इसी को मद्देनज़र रखते हुए उत्तर प्रदेश का राज्य का प्रभारी संजय सिंह को बनाया गया है । प्रदेश अध्यक्ष पद भी दायित्व अपर कास्ट के ही सभाजीत सिंह को सौपा गया है। पार्टी की जो टॉप लीडरशिप है, वह भी अपरकास्ट ही है।

ओवैसी की तरह आम आदमी पार्टी ने भी यूपी में चुनाव लड़ने का ऐलान कर राज्य की बड़ी पार्टियों को उनके समीकरण बिगाड़ने का खौफ तो पैदा ही कर दिया हैं। अगर गठबंधन जैसी कोई नौबत आती है तो समाजवादी पार्टी शहरी इलाकों की कुछ सीटें आम आदमी पार्टी के लिए छोड़कर अरविंद केजरीवाल को अपने पाले में खड़ा करने का दांव चल सकती है लेकिन अभी इस बाबत पक्के तौर पर कुछ नहीं कहा जा सकता हां जहाँ तक जेडीयू और एलजीपी के चुनाव लड़ने की बात है तो उनका दबाव बीजेपी के लिए है पूर्व के कई चुनावों में यह दोनों पार्टियां यूपी में बीजेपी के साथ गठबंधन का हिस्सा रह चुकी हैं लेकिन 2017 के विधानसभा चुनाव और 2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने इन दोनों पार्टियों को गठबंधन का हिस्सा नहीं बनाया था।

बीजेपी ने लोकसभा चुनाव में अपना दल के लिए सीटें छोड़ी थीं, जब कि विधानसभा चुनाव में अपना दल के साथ साथ ओमप्रकाश राजभर की पार्टी के साथ गठबंधन किया था। बीजेपी के सहयोगी दल के रूप में अपना दल को नौ और सुहैलदेव भारतीय समाज पार्टी को चार सीट पर जीत मिली थी। एसपी ने 47, कांग्रेस ने 7, बीएसपी ने 19 सीट जीतीं थीं। तीन पर निर्दलीय जीते थे। राज्य विधानसभा में कुल 403 सीट हैं जो कि पूरे देश में सबसे ज्यादा हैं। 2017 के यूपी के विधानसभा चुनाव के लिए 302 पार्टियों ने अपनी किस्मत आजमाई थी, जिनमें छह राष्ट्रीय पार्टियां थी, दो राज्य स्तर की मान्यता प्राप्त, पांच अन्य राज्यों में मान्यता प्राप्त और 289 पंजीकृत गैर मान्यता प्राप्त पार्टियां थी। बहरहाल अभी से ही यू पी में बढ़ी चुनावी सरगर्मी इस बात की सूचक है की अन्य राज्यों के देखते हुए देश के इस सूबे में इस बार २०२२ की चुनावी जंग बेहद दिलचस्प होने वाली है!



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