तूल किट-किटाहट जारी है!
| -RN. Feature Desk - Feb 16 2021 1:29PM

-रामविलास जांगिड़ 

मामला एकदम गरम हो चुका है। बोले तो लोहा एकदम गरम है, मार दो हथोड़ा! कमर तैयार है, मार दो कौड़ा! नमक डाल दो, पक गया फोड़ा। सीधे-सीधे कहे तो मामला तूल पकड़ता जा रहा है। तूल पकड़ने वाले मामले को किसी के कंधे पर लादकर टूल किट-किट में बदला जा सकता है। टूल की भूल, मामले ने पकड़ा तूल! बिखर गए शूल! जनता बनी महाफूल! सियासत बाजी में रायता फैलाने का ही है रूल! लोहे को गर्म करने के लिए लोग अपनी-अपनी भट्टी जला चुके हैं। हवा मार रहे हैं। किसकी भट्टी किसका लोहा, बोल झमूरे कड़वा दोहा। बोल झमूरे बोल, सियासत के पट खोल। 'तूल किट अब देखिए, हर सियासत मांय। शूल टूल ही मूल है, मचा है कांय-कांय।

टि्वटर-टि्वटर शूल है, चहूं दिशी उड़ती धूल। जनता है मासूम सी, बनी बेचारी फूल। वे आज भी रात में जग गए। उन्होंने अलग-अलग तरह के मामलों की लिस्ट बनाई। किस मामले को तूल देना है और किस मामले को भूल में लेना है। इसके लिए बाकायदा सोशल मीडियाबाजों की एक समिति गठित की। देखते ही देखते ट्विटरबाज व्हाट्सएप इंस्टाग्राम से होते हुए फेसबुकीय सियासती कायनात में फैल गए। सच तो यह है कि उन्होंने ऐसा तूल किट बनाया कि अब राजा सिर्फ सोशल मीडिया बाज ही तय करने लगा है। हर एक ऐप हर घर में झांककर हर एक सज्जन की बुद्धि हैक करने लगा है। 

उन्होंने दूसरों की बंदूक को तीसरे कंधे लगाकर चौथे से घोड़ा दबवा पांचवे से सियासत बाजी शुरू कराई। पहला एकदम गायब है! फिर बंदूक चलाने वाले पर उन्होंने तूलकिट फन्ना मारा। चूल्हा किसी और ने जलाया। तवा किसी और ने चढ़ाया; और फटाक से उन्होंने अपनी रोटियां सेक ली। फिर चूल्हा जलाने वाले मामले को तूलकिट में बदल दिया। इधर मामला बड़ा गचा-गच होने लगा है। जिसे अच्छा-खासा कवि समझते हैं, वह अंत में सियासत बाज ही निकलता है। जिसे अच्छा-खासा समाजसेवी समझते हैं, वह भी खूंखार सियासत-दान ही निकलता है।

मामला यह है कि जिस किसी पत्थर के नीचे हाथ डालो एक नया सियासत बाज फन फैलाए दिखाई पड़ता है। हर एक फूल में घटाटोप शूल लगे हैं।सियासत ऐसा सांप है, जो बीन को नचा डालता है। घर में पति-पत्नी से लेकर बाप-बेटे के बीच भी सियासत पसरी पड़ी है। वे अपने-अपने ढंग से अपने-अपने टूल बनाए हुए बैठे हैं। पूरा टूल किट! हर एक टूल में शूल ही शूल लगे हैं। यह टूल हर किसी को फूल उर्फ मूर्ख बनाने के लिए तैयार है। घर के चार जने भी, 'आज यही सब्जी बनेगी', जैसे अपने-अपने वाक्य हवा में उछालते हैं।

वे इस घरेलू मुद्दे को तूल देकर अच्छे खासे बसंत को बस अंत ही करते हुए 'डोंट पंच मी' का गीत गाते हैं। फिर पड़ोसी आकर बताता है कि तुम्हारे कूकर में यही काली दाल बनानी चाहिए। घर में अपना-अपना कूकर, अपनी-अपनी सीटी बजने लगती है। ...तो बोल झमूरे! यह खेल कब तक जारी रहेगा? तब झमूरे ने अपना पेट दिखाते हुए कहा- "उस्ताद यह पेट कमबख्त ऐसी चीज है कि कभी भरता ही नहीं! लोगों के बड़े-बड़े, बड़े-बड़े, महाबड़े पेट हैं! इनके पेट का विस्तार जाने कहां तक फैला है उस्ताद! ये मामले को तूल देते हैं। जनता को शूल देते हैं। हर दिशा में तूल किट-किटाहट जारी है!"



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