थूकने-चाटने का कार्यक्रम जारी है!
| -RN. Feature Desk - Feb 19 2021 5:03PM

-रामविलास जांगिड़ 

थूक पुल्लिंग संज्ञा पद है। यह जीभ एवं मांस की झिल्लियों के बीच बड़े मजे से मुंह में विराजित होता है। ष्ठीवन, खखार, लार आदि के सहयोग से थूक एक परम पद प्राप्त करता है। इन दिनों मार्केट में विशिष्ट वैचारिक थूक एक खास प्रसिद्धि पा रहा है। गाली मिश्रित वैचारिक थूक तो बहुत धमाल मचा रहा है। यह रस भिन्न जंतुओं में भिन्न-भिन्न प्रकार का होता है। हिंदी के मूल शब्द थूक में जब 'ना' प्रत्यय लगाया जाता है, तो थूकना की उत्पत्ति होती है। उर्दू में इसे थुकिना कहते हैं। बंगाली में थूथूदिच्चे कहते हैं। अंग्रेजी में स्पिटिंग। तमिल में तुप्पुतल। गुजराती में थुंकवू। मराठी में थुंकणे। चीनी में सईथी-थु-थेन।

चाइनीस में बोले गए इस शब्द के साथ थूक मुंह से उछलकर शर्तिया सामने वाले के ऊपर गिरता ही गिरता है। और अन्य-अन्य भाषाओं में इसे क्या कहा जाता है, इन सबका ठेका मैंने नहीं ले रखा है। आप भी तो कुछ कसरत कीजिए श्रीमान! इस समय थूकना और चाटना दोनों क्रियाएं एक साथ संचालित की जा रही है। कोई एक थूकता है और दूसरा फटाक से चाट लेता है। अक्सर थूकने एवं चाटने की क्रियाएं एक ही बंदा संपादित कर लेता है। थूकने एवं चाटने के हैरतअंगेज कारनामे दिखाने वाले एक ही बंदे को सियासत दान कहते हैं। इस दल से उस दल तक। इस नेता से उस नेता तक। थूकने-चाटने का सांस्कृतिक कार्यक्रम जारी है।

दुनिया में इस समय थूक का कारोबार बहुत फैल गया है। राजनीति से लेकर शिक्षा, साहित्य, स्वास्थ्य, संस्कृति तक थूकबाजी पसरी है। हर एक बंदा थूकविज्ञ बनकर सामने खड़े थूकाधिकारी पर थू-थू कर रहा है। एक का थूक दूसरे-तीसरे के द्वारा चाटने के साथ ही एक का थूक स्वयं एक भी चाट रहा है। थूकने के मामले में मैं भी कमजोर नहीं हूं। फिलहाल जो कुछ भी मेरे मुंह में भरा हुआ है, उसे थूकने की परम इच्छा हो रही है। अस्पताल की दीवारों, क्लासरूम में लगे बोर्ड पर थूक की शानदार पच्चीकारी करने के बाद, अब मैं भी टीवी पर बैठकर थूकना चाहता हूं। 

टीवी पर कई-कई ऐसे कलहकार बैठे हैं, जो अपने थूक की कीमत वसूल रहे हैं। वे घर से रोटी-बोटी खाकर टीवी पर बैठ अपनी-अपनी पार्टी के अनुसार थूकने लगते हैं। वे रोज थूक उछालने का अखंड राष्ट्रीय कार्यक्रम कर रहे हैं। अज्ञानी लोग इसे व्यर्थ की बकवास करना कहते हैं। टीवी, माइक आदि देखते ही वे अपने मुंह में थूक बिलोने लगते हैं। इस क्रिया में अपने मुंह में बने वैचारिक थूक को बिलोते रहते हैं। इस थूक बिलोने की प्रक्रिया में उन्होंने महारत हासिल की है। उनके विरोधी लोग इसे व्यर्थ बकना, अनुचित प्रलाप करना, हराना, नीचा दिखाना, चूना लगाना, हैरान और तंग करना आदि कहते हैं।

लेकिन विरोधी थूकबाज भी कम नहीं होते। वे उन्हें थूक लगाकर भी नहीं छोड़ते। उन्हें नीचा दिखाकर, तंग और लज्जित करके भी छोड़ना पसंद नहीं करते और लगातार उनके थूक लगाते रहते हैं। सियासत इस समय दो हिस्सों में बंटी है। एक हिस्सा थूकता है और दूसरा चाटता है। लेकिन इनमें ऐसे सियासत दान ही प्रसिद्धि पाते हैं, जो स्वयं ही थूकते और स्वयं ही चाट जाते हैं। ऐसे सियासत दान ही मंच पर मौजूद है। आइए! हम सब मिलकर थूकन-चाटन कार्यक्रम को एक जन आंदोलन में बदलें!



Browse By Tags



Other News