तो इन्हें है अफ़ग़ानी महिलाओं के 'हितों की चिंता ?
| -Nirmal Rani - Sep 14 2021 11:13PM

- निर्मल रानी  

अफ़ग़ानिस्तान पर तालिबानी नियंत्रण के बाद भारत सहित दुनिया के कई देशों यहां तक कि संयुक्त राष्ट्र संघ में भी इस बात को लेकर चिंता जताई जा रही है कि तालिबानों के शासन काल में शरिया क़ानून की आड़ में महिलाओं के अधिकारों का ज़बरदस्त हनन हो सकता है। हालांकि ताज़ा ख़बरों के अनुसार तालिबान ने महिलाओं के लिये अलग स्कूल कॉलेज में पढ़ाई करने की बात की है। परन्तु हमारे देश में अफ़ग़ानिस्तान की हालत पर ख़ासकर वहां महिलाओं की संभावित दयनीय स्थिति पर कुछ ज़्यादा ही शोर शराबा किया जा रहा है। बेशक हमारे देश में महिलाओं को लगभग हर क्षेत्र अपनी प्रतिभा निखारने की पूरी आज़ादी है। वैसे भी स्वतंत्र भारत में इंदिरा गाँधी जैसी विश्व की महान नेता ने लगभग 14 वर्षों तक देश के प्रधानमंत्री पद को सुशोभित कर यह साबित कर दिखाया कि भारतवर्ष पुरुषों व महिलाओं के मध्य भेदभाव यहां तक कि राजनैतिक वर्चस्व को लेकर भी लिंग भेद नहीं रखता। कुछ ऐसा ही उदाहरण पिछले दिनों बंगाल चुनाव परिणामों ने ममता बनर्जी को भारी जीत दिलाकर भी पेश किया। सवाल यह है कि क्या यह उदाहरण यह साबित करते हैं कि भारत में महिलाओं की स्थिति,उनका मान सम्मान उनकी सुरक्षा आदि सब कुछ वैसा ही है जैसा कि इन चंद उदाहरणों में देखने को मिलता है ? तालिबानी मानसिकता को हम महिला विरोधी मानसिकता रखने वाला रूढ़ीवादी संगठन कहते हैं और अफ़ग़ानी महिलाओं के प्रति अपनी चिंताओं का इज़हार करते नहीं थकते। शायद उसी तरह जैसे कि मुसलमानों के अतिसूक्ष्म वर्ग में प्रचलित तिहरे तलाक़ को लेकर हम बहुत चिंतित थे ?

परन्तु हमारे दोहरे चरित्र वाले समाज की हक़ीक़त तो कुछ और ही है। धर्म और राजनीति में अहम पदों व गद्दियों पर बैठे लोग आज महिलाओं के सम्मान व स्वतंत्र अधिकारों वाले देश भारत में महिलाओं को किस नज़र से देखते हैं इसके सैकड़ों उदाहरण देखे सुने जा सकते हैं। अफ़ग़ानिस्तान में पुरुषवादी वर्चस्व को यदि तालिबानी शरिया के नाम पर क़ायम रखना चाहते हैं तो हमारे देश में भी अनेक लोग अपने दुर्भावना पूर्ण वक्तव्यों से अपने मस्तिष्क में घुसे तालिबानों से भी ख़तरनाक विचारों को उजागर करते रहते हैं। इन दिनों ग़ाज़ियाबाद का एक पुजारी उस समय से काफ़ी चर्चा में जबसे उसके मंदिर के बाहर लगे प्याऊ पर एक छोटे लड़के की कुछ लोगों द्वारा सिर्फ़ इसलिये पिटाई की गयी थी क्योंकि वह हिन्दू नहीं था और मंदिर के प्याऊ में पानी पी रहा था। यह पुजारी महोदय उस समय प्यासे लड़के के पक्ष में नहीं बल्कि प्यासे की पिटाई करने वाले हट्टे कट्टे युवकों के पक्ष में खड़े थे। इसी घटना से इनकी मानसिकता तथा इनकी कथित 'हिन्दूवादिता ' का अंदाज़ा लगाया जा सकता है। आज इसी घटना ने इनको प्रसिद्धि क्या दिला दी कि इन्होंने जब जो चाहे,जहाँ चाहे बोलना शुरू कर दिया। गत दिनों उनका एक वीडीओ वायरल हुआ जिसमें वे कहते सुने गये कि- 'बी जे पी में जितनी भी महिलायें दिखाई दे रही हैं वो एक नेता के पास गईं और दूसरे के पास नहीं तो उनका काम नहीं होता। तीसरे से काम है तो तीसरे के पास जाना है। अब ये हैं ईमानदार और चरित्रवान लोग। ये है राजनीति। जितनी महिलायें राजनीति करती घूमती हैं। पूरा मज़ा आ रहा है। '

 'धर्मगुरु ' के इस बयान के बाद वही महिलायें इनपर आग बबूला हो गयीं जो प्याऊ काण्ड में केवल हिन्दू होने के नाते इनके साथ खड़ी थीं। परन्तु चूंकि इस बार उसने भजपाई महिलाओं की स्मिता पर हमला किया इसलिये इसके इस आपत्तिजनक बयान का पुरज़ोर विरोध हुआ। महिलाओं को नीचे दिखाने व उन्हें अपमानित करने वाले इस तरह के तमाम बयान धर्मगुरुओं द्वारा दिए भी जाते हैं और अनेक धर्मगुरु महिलाओं के शारीरिक शोषण में शामिल भी पाए जाते हैं। इससे इनके अनुयाईयों पर महिलाओं को लेकर आख़िर क्या छवि बनती होगी? इनके अनुयायी और ऐसे गुरुओं के अंधभक्त महिलाओं को सम्मान व अस्मिता विहीन दैहिक शोषण की वस्तु अर्थात भोग्या मात्र नहीं तो और क्या समझेंगे? आये दिन कोई धर्मगुरु,कोई नेता या कोई अधिकारी अथवा विशिष्ट व्यक्ति जब महिलाओं के शोषण अथवा बलात्कार में सम्मिलित पाया जाता है,जब नेताओं द्वारा अश्लील फ़िल्में सदन में बैठकर देखी जाती हों ऐसे वातावरण में देश में बलात्कारियों और वह भी दुर्दांत बलात्कारियों व हत्यारों की संख्या रोज़ाना बढ़ेगी या नहीं ?

सोशल मीडिया पर अभी तक वह वीडिओ मौजूद है जिसमें मुख्य मंत्री योगी आदित्यनाथ की मौजूदगी में उनकी पार्टी का एक नेता सार्वजनिक रूप से यह कहता है कि 'मुसलमानों की औरतों को क़ब्र से निकाल कर बलात्कार करना चाहिये '। इसके बाद योगी का भाषण हुआ और उन्होंने उस व्यक्ति के इस क़द्र आपत्तिजनक भाषण पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। बाद में योगी जी इसी सांप्रदायिक वातावरण की शाख़-बेल फूटने पर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बन गये। और इतनी अभद्र भाषा बोलने वाले नेता का भी कुछ नहीं बिगड़ा। पिछले दिनों लोकजनशक्ति पार्टी के एक सांसद प्रिंस राज के विरुद्ध बलात्कार संबंधी प्राथमिकी एक महिला ने दर्ज कराई। इनके माता पिता ने कितने अरमानों से इनका नाम 'प्रिंस ' भी रखा और 'राज ' भी कि बड़ा होकर उनका नौनिहाल किसी 'प्रिंस' की तरह 'राज' करेगा। परन्तु इनके आचरण के चलते इनके भाग्य में तो बलात्कार का आरोपी बनना लिखा था। अब ऐसे युवा 'माननीयों ' के युवा समर्थकों की फ़ौज इनसे क्या प्रेरणा लेगी ? वे अपने इर्द गिर्द की महिलाओं को क्या सम्मान की नज़रों से देखेंगे या 'भोग्या ' की नज़रों से ?

अफ़ग़ानिस्तान में तालिबानी राज हो या न हो परन्तु वहां से कभी किसी 'निर्भया ' जैसे हादसे की ख़बर नहीं आती ,जबकि हमारे देश के अख़बार तो अक्सर बताते रहते हैं कि देश में एक और 'निर्भया काण्ड ' हुआ। यह मानसिकता तालिबानी मानसिकता नहीं बल्कि 'राक्षसीय मानसिकता' है क्योंकि महिलाओं को खुली आज़ादी न देकर तो तालिबानी लोग 'शरिया ' की आड़ ले लेते हैं परन्तु क़ब्र से खोद कर बलात्कार करने,धर्म के आधार पर बलात्कारियों का साथ देने और पीड़िता के विरुद्ध खड़े होने,धर्म गुरुओं व नेताओं तथा अनेकानेक विशिष्ट व्यक्तियों व 'माननीयों ' द्वारा हमारे देश में महिलाओं के साथ जो बर्ताव किया जाता है अथवा जो नज़रिया रखा जाता है उसे तो न कोई धार्मिक शिक्षा सही ठहरा सकती है न कोई तर्क अथवा समाजशास्त्र। देवियों की पूजा करना और कन्याओं की कंजक पूजा आदि कार्यकलाप उस समय धरे के धरे रह जाते हैं जब देश के किसी भी कोने से बलात्कार,सामूहिक बलात्कार व बलात्कार के बाद नृशंस हत्याओं यानी 'निर्भया काण्ड ' दोहराये जाने जैसे ख़बरें आती रहती हैं। उस समय यह ज़रूर सोचना पड़ता है कि क्या इन्हीं बलात्कारी मानसिकता के लोगों को हर समय अफ़ग़ानी महिलाओं के 'हितों की चिंता सताये रहती है ?

                                                                           



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