तर्पण
| -RN. Feature Desk - Sep 27 2021 2:04AM

-प्रियंका वरमा माहेश्वरी

"पंडित जी क्या हालचाल है? पाय लागू महाराज! तर्पण करवाना है। कल तिथि है माता जी की और कुछ दिन बाद पिताजी की भी.... बता दूंगा मैं आपको। आप आकर सारे कर्मकांड करवा दीजिए।" पंडित जी:- "हां अवश्य आ जाएंगे। कल नौ बजे हम आएंगे और यह सामान की लिस्ट है मंगवा कर रख लेना।" 
किशन:- "जी महाराज! पाय लागू।"
किशन और पंडित जी के जाने के बाद दो चार बुजुर्गवार खड़े थे। उन दोनों की बातचीत सुनकर वे आपस में बातें करने लगे। पहले सज्जन बोले, "जब तक मां जिंदा थी ख्याल नहीं रखा। बिचारी ऐसे ही तड़प कर मर गयी। अरे इसकी औरत ने तो खाने तक को तरसा डाला। बिचारी भाभी शरीर से लाचार हो गई थी वरना सारे दिन कुछ न कुछ करते ही दिखती थी। दूसरे सज्जन बोले, "अरे भैया बुढ़ापा होता ही खराब है, पता नहीं कितने तो रोग लग जाते हैं शरीर में। फुर्ती तो गायब ही हो जाती है। चलना फिरना भी दूभर हो जाता है। तीसरे सज्जन बीच में बात काटते हुए बोले, "अरे पता है अशोक के यहां का मामला उसने भी तो अपने माता पिता को वृद्धाश्रम भेज दिया था। माता-पिता दोनों की तबीयत ठीक नहीं रहती थी। उसकी औरत रोज झगड़ा करती थी। 
आखिर में वह उन दोनों को वृद्धाश्रम छोड़ आया। सोचता हूं कि मां बाप ने क्या पाप किए होंगे जो ऐसी औलाद को जन्म दिया। बच्चों को पाल पोस कर बड़ा करने में कितनी तकलीफें आती है यह बच्चे भूल जाते हैं। और चार दिन की आई लड़की से रिश्ता निभाने के लिए जन्म के रिश्तो को ठुकरा देते हैं। तभी पहले सज्जन बोले, "अरे तो यह किशन कौन सा दूध का धुला है, मां चाय, पानी और खाने के लिए आवाज देती रहती थी और दोनों मियां बीवी के कान पर जूं नहीं रेंगती थी। जीते जी तो ध्यान नहीं रखा अब श्राद्ध कर रहा है।"
दूसरे सज्जन बोले, "क्यों तुम्हें गोविंद के घर का हाल मालूम नहीं।"
पहले सज्जन:- "मालूम है भाई मालूम है बहू दिन भर तो अपनी सास से काम करवाती थी और झगड़ा अलग से करती थी। आखिरकार बिचारी ठंड से मर गई। अब हर साल श्राद्ध करता है आत्मा की शांति के लिए। कितना पाखंड है... कितनी विचित्र मानसिकता है। मन कलुषित हो जाता है यह सब देख कर।"
तीसरे सज्जन बोले,  "हां तो यह किशन ने भी क्या किया? एक तरह से भूखा ही मार डाला अपनी मां को। ना ठीक से इलाज किया और ना ही खानपान पर ध्यान दिया। बाप को तो अलग से नौकर बना कर रखा था। इस उम्र में भी घर के काम करते थे।" 
दूसरे सज्जन;- "हां भाई, क्या करें लोगों में अपने माता पिता के प्रति प्रेम और सम्मान रह नहीं गया है। बाहर पंडित जी के पैर छू रहे हैं और घर में मां से कभी प्यार के बोल नहीं बोलते। आज मुझे ही अपने बेटे बात किए हुए चार चार दिन बीत जाते हैं। चेहरा तक नहीं दिखाता बाकी कोई बात करें भी तो क्या करें? अरे मेरी पत्नी बता रही थी कि उसकी छोटी बहू तो एक कटोरी सब्जी देने के लिए भी मुंह बनाती थी। उसकी सास को चटपटा खाने का शौक था और छोटी बहू खाना अच्छा बनाती थी लेकिन मजाल है कि एक कटोरी सब्जी अपनी सास को दे दे और तो और एक दिन उसने दोनों को यह कहते हुए सुन लिया कि, "ना जाने कब मरेंगे यह दोनों"।
समझ में नहीं आता कि हम बोझ क्यों बन जाते हैं बच्चों पर? हमने तो कभी नहीं माना उन्हें बोझ? अपने खून से सींचते हैं उन्हें। हमारे प्यार और परवरिश में क्या कमी रह जाती है? जो यह इतने संवेदनहीन हो जाते हैं कि अपने माता-पिता से विमुख हो जाते हैं। हमारा दर्द, तकलीफ सब नजरअंदाज कर देते हैं। अपमानित कर देते हैं। आखिर क्यों? जो बच्चे जीते जी सुख नहीं दे सकते हैं तो मरने के बाद किया हुआ तर्पण किस काम का? पितृपक्ष में पितर कौन सा आशीर्वाद देते होंगे इन्हें?



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