नेता अपराधी-'बाबू' चरित्रवान - कैसे बढ़े देश का मान ?
| -Tanveer Jafri - Nov 21 2021 1:35AM

-  तनवीर जाफ़री 

1997 में जिस समय देश स्वतंत्रता की पचासवीं वर्षगांठ मना रहा था उस समय भी देश की संसद ने राजनीति के अपराधीकरण के विरुद्ध सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित किया था। परन्तु दुर्भाग्यवश आजतक उस पर अमल नहीं किया जा सका। उसके बाद देशवासियों से 2014 से पूर्व जहां प्रत्येक वर्ष दो करोड़ लोगों को रोज़गार देने,सभी के खातों में पंद्रह पंद्रह लाख रूपये डालने,डीज़ल,पेट्रोल व रसोई गैस की क़ीमतें कम करने,डॉलर के मुक़ाबले रूपये को सुदृढ़ करने,भयमुक्त समाज बनाने तथा मंहगाई दूर करने जैसे तमाम लोकलुभावन वादे किये गये थे वहीँ एक वादा देश को अपराधमुक्त किये जाने का भी किया गया था।

ख़ास तौर पर 'राजनीति को अपराधमुक्त' किये जाने का वादा भारतीय जनता पार्टी ने अपने चुनावी घोषणापत्र में भी किया था और 2014 के चुनाव पूर्व स्वयं नरेंद्र मोदी भी अपने कई चुनावी भाषणों में इसी तरह के वादे करते सुने गये थे। प्रधानमंत्री बनने से पूर्व बिना भेदभाव के एक वर्ष के अंदर जिस संसद को अपराध मुक्त बनाने का वादा किया गया था वह सात वर्षों बाद भी पूरा नहीं हो सका। 2014 में राजस्थान की एक चुनावी सभा में बड़ा ही आत्मविश्वास दिखाते हुए मोदी ने कहा था कि - ‘आजकल यह चर्चा ज़ोरों पर है कि अपराधियों को राजनीति में घुसने से कैसे रोका जाए? मेरे पास एक इलाज है और मैंने भारतीय राजनीति को साफ़ करने का फ़ैसला कर लिया है।

मैं इस बात को लेकर आशान्वित हूं कि हमारे शासन के पांच सालों बाद पूरी व्यवस्था साफ़ -सुथरी हो जाएगी और सभी अपराधी जेल में होंगे। मैं वादा करता हूं कि इसमें कोई भेदभाव नहीं होगा और मैं अपनी पार्टी के दोषियों को भी सज़ा दिलाने से नहीं हिचकूंगा.’। परन्तु यह आख़िर कैसा इत्तेफ़ाक़ था कि 2014 के ही लोकसभा चुनाव में भाजपा के 282 विजयी सांसदों में से 35प्रतिशत यानी 98 सांसदों के विरुद्ध आपराधिक मामले दर्ज थे। जबकि इन्हीं में से से 22 प्रतिशत सांसदों के विरुद्ध गंभीर आपराधिक मामले दर्ज थे। इतना ही नहीं बल्कि मोदी ने जिन 78 सांसदों को केंद्रीय मंत्री बनाया उसमें से 31 प्रतिशत के विरुद्ध  आपराधिक मामले दर्ज थे। और उनमें भी 18 प्रतिशत यानी 14 मंत्रियों के विरुद्ध गंभीर आपराधिक मामले दर्ज थे.

अब सवाल यह कि राजनीति को अपराध मुक्त बनाने के वादे का आख़िर क्या हुआ? वास्तव में राजनीति में अपराधियों की हो चुकी घुसपैठ कितनी भयावह रूप धारण कर चुकी है इसका अंदाज़ा कुछ दिनों पहले माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा आपराधिक छवि वाले नेताओं के रिकॉर्ड का चुनाव में ख़ुलासा करने के अपने आदेश की अवमानना (कंटेम्प्ट) पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा की गयी तीखी टिप्पणी से लगाया जा सकता है।

इस टिपण्णी में  माननीय उच्चतम न्यायालय ने दो टूक शब्दों में कहा कि - 'राजनीतिक व्यवस्था के अपराधीकरण का ख़तरा बढ़ता जा रहा है। इसकी शुद्धता के लिए आपराधिक पृष्ठभूमि वाले व्यक्तियों को क़ानून निर्माता बनने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। मगर हमारे हाथ बंधे हैं। हम सरकार के आरक्षित क्षेत्र में अतिक्रमण नहीं कर सकते। हम केवल क़ानून बनाने वालों की अंतरात्मा से अपील कर सकते हैं।' सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी जहाँ सत्ता को आईना दिखाती है वहीँ यह टिप्पणी अदालत की सीमाओं के चलते उसकी 'बेबसी ' को भी दर्शाती है।

 परन्तु सत्ताधीशों की चिंता कुछ और ही है। वे देश को अपराधी पृष्ठभूमि रखने वाले नेताओं से अधिक  'बाबुओं' के हाथों में देश सौंपे जाने से भयभीत हैं। उन सरकारी बाबुओं से जिनको पढाई के कठिन परिश्रम के बाद बेहद सख़्त स्तर की प्राथमिक परीक्षा मुख्य परीक्षा तथा कठोरतम साक्षात्कार से गुज़रने व इसे क्वालिफ़ाई करने के बावजूद 'पुलिसिया चरित्र प्रमाण पत्र ' का मोहताज होना पड़ता है। 'बाबू ' जिस इलाक़े का रहने वाला है वहां की पुलिस चौकी से 'बाबू ' के चरित्र व उसके आपराधिक रिकॉर्ड की संपूर्ण जानकारी मांगी जाती है।

यदि इत्तेफ़ाक़ से उसपर किसी तरह का कोई मामला थाने चौकी में दर्ज है तो उसकी 'बाबूगीरी ' की नौकरी ख़तरे में पड़ सकती है । परन्तु हमारे देश के माननीय चाहे जितने और चाहे जितने गंभीर अपराधों में मुजरिम क्यों न हों,परन्तु वे चुनाव भी लड़ सकते हैं,जीत भी सकते हैं,मंत्री भी बन सकते हैं और जिस पुलिस विभाग के सिपाही को देखकर कभी बिलों में छुप जाया करते थे उसी विभाग के बड़े से बड़े अधिकारी के सामने अपनी मूंछे भी ऐंठ सकते हैं और उसे इन अपराधियों को सैल्यूट मारने  के लिये भी बाध्य होना पड़ता है। देश के शिक्षित समाज के लिये इससे बड़ा दुर्भाग्य और क्या हो सकता है?

पिछले दिनों देश के गृह मंत्री लखनऊ,उत्तर प्रदेश में फ़रमा रहे थे कि 'उत्तर प्रदेश में अब अपराधी दूरबीन से देखने पर भी नज़र नहीं आते'। इसके जवाब में उसी समय प्रियंका गांधी ने कहा था कि 'दूरबीन नहीं चश्मा लगाइये और अपने पीछे खड़े अपराधी को देखिये'। उनका इशारा गृह राज्य मंत्री अजय मिश्रा टोनी की ओर था जो उस समय गृह मंत्री के साथ खड़े थे। यह वही टोनी थे जिनके नाम की हिस्ट्री शीट संबंधित थाने में खुल चुकी है। और उन्हीं के पुत्र पर किसानों को कुचल कर मारने का आरोप है। भाजपा के अनेक नेताओं पर दंगे,फ़साद फैलाने जैसे कई गंभीर आपराधिक मुक़द्द्मे चले जिन्हें सरकार ने वापस लिये।

आज पूरे देश  में विभिन्न दलों के सैकड़ों 'माननीय ' ऐसे हैं जिनपर आपराधिक मुक़द्द्मे चल रहे हैं। भ्रष्टाचार और आय से अधिक धन संपत्ति अर्जित करने वाले राजनेताओं की तो संख्या ही बेहिसाब है। देश के गौरव का झूठा गुणगान करने वालों  को क्या यह नहीं पता कि क्या दुनिया आज के इंटरनेट युग में ' माननीयों ' के रिकॉर्ड के  बारे में सब कुछ जानती है? जिस देश  में अपराधी व अशिक्षित लोग क़ानून बनाते हों और इसी व्यवस्था में 'बाबू' बेदाग़ व चरित्रवान ढूंढें जाते हों उस देश का मान आख़िर कैसे बढ़ेगा ?
                                                                   
                                                            



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