आज और आने वाले कल की मांग है ऊर्जा संरक्षण व दक्षता प्रोत्साहन
| -RN. Feature Desk - Dec 16 2021 1:39AM

दुनिया के देशों की सरकारें अब ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन को कम करने के साथ ही ऊर्जा की बरबादी को कम करने को लेकर भी गंभीर होने लगी है। इसी का परिणाम है कि परंपरागत ऊर्जा साधनों के स्थान पर नयी व नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों पर अधिक बल दिया जाने लगा है। इसके साथ ही ऊर्जा संरक्षण व दक्षता को प्रोत्साहित किया जा रहा है। बिजली की बचत, कम ऊर्जा खपत वाले मानक उपकरणों के उपयोग को बढ़ावा देने और ऊर्जा बचत के स्टार मानक उपकरणों की सहज उपलब्धता सुनिश्चित करने की दिशि में तेजी से काम किया जा रहा है। एक और परंपरागत ऊर्जा साधनों में कम विद्युत खर्च करने वाले दक्षतायुक्त उपकरणों को बाजार में लाने के साथ ही निरंतर अनुसंधान कर ऊर्जा बचत के उपकरण लाने लगे हैं तो दूसरी और लोगों को अवेयर किया जा रहा है कि ऊर्जा बचत आज की ही नहीं बल्कि भविष्य की भी जरुरत है। आखिर कब तक प्रकृति से खिलवाड करते रहेंगे। यही कारण है कि बल्ब की दुनिया से बाहर निकलकर अब एलईडी का जमाना आ गया है तो कम बिजली खपत वाले पांच सितारा विद्युत उत्पाद आमआदमी की सहज पहुंच वाली दरों में बाजार में आने लगे हैं। सबसे खास बात यह कि सरकारों द्वारा इसके लिए प्रोत्साहित किया जाने लगा है। इसके साथ ही नवीकरणीय अक्षय ऊर्जा क्षमता का तेजी से विकास हो रहा है। राज्यों को प्रोत्साहित करने के लिए सालाना पुरस्कार दिए जाने लगे हैं।

ऊर्जा दक्षता के प्रति गंभीरता को इसी से समझा जा सकता है कि दुनिया के देशों में 14 दिसंबर को ऊर्जा दक्षता दिवस के रुप में मनाया जाता है। जहां तक हमारे देश का सवाल है 14 दिसंबर 1991 को पहली बार  ऊर्जा दक्षता दिवस की शुरुआत कर राज्यों के बीच स्वस्थ्य प्रतिस्पर्धा कायम करते हुए पुरस्कार दिए जाने आरंभ किए गए। सार्थी पोर्टल के माध्यम से नियमित मोनेटरिंग की जाने लगी है। विभिन्न कैटेगरी में राज्यों की ऊर्जा बचत प्रयासों की मोनेटरिंग करते हुए राज्यों की रेंकिंग की जाती है। इसके परिणाम भी प्राप्त होने लगे हैं हांलाकि अभी इस क्षेत्र में लंबा सफर तय किया जाना है।

कार्बन उत्सर्जन को कम करने और इकोलोजिकल सिस्टम को बनाए रखने के लिए दुनिया के देशों के बीच लगातार संवाद कायम है और कार्बन उत्सर्जन को कम करने के लिए लक्ष्यों का निर्धारण और निर्धारित गोल प्राप्त करने के लिए प्रयास किए जा रहे हैं। कमोबेस यह जिम्मेदारी विकसित व संपन्न देशों पर अधिक हो जाती है पर संपन्न देश कितने गंभीर है यह किसी से छिपा भी नहीं है। इतना जरुर है कि अब गैर पंरापरागत ऊर्जा के क्षेत्र में आगे आने लगे हैं। भारत ने वर्ष 2005 के उत्सर्जन तीव्रता को 2030 तक 30 से 35 प्रतिशत तक कम करने का लक्ष्य रखा है और इसके लिए अक्षय ऊर्जा क्षमता को 2030 तक करीब 450 गीगावाट बढ़ाने का लक्ष्य रखते हुए आगे बढ़ रहे हैं। इस साल की शुरुआती 9 माहों जनवरी से सितंबर, 21 के दौरान देश में 7400 मेगवाट सौर ऊर्जा क्षमता में बढ़ोतरी हुई है। इसमें राजस्थान की भागीदारी प्रमुख हो जाती है। प्रदेश में करीब 2500 मेगवाट क्षमता के सौर ऊर्जा  संयत्रों की स्थापना हुई है। यह अपने आप में बड़ी बात है।  

भारत सरकार के विद्युत मंत्रालय एवं ब्यूरो ऑफ एनर्जी एफिशिएंसी द्वारा राज्यों द्वारा विभिन्न क्षेत्रों में विद्युत बचत प्रयासों की मोनेटरिंग की जाने लगी है। हाल ही में नई दिल्ली में स्टेट एनर्जी एफिशिएंसी इन्डेक्स 2020 मे राजस्थान सहित देश में उल्लेखनीय प्रयास करने वाले राज्यों को विभिन्न कैटेगरी में चयनित कर पुरस्कृत किया गया है। पिछले दिनों जारी इंडेक्स् परिणामों में ऊर्जा दक्षता के क्षेत्र में किये गये कार्यो के आधार पर देश में सर्वोच्च श्रेणी फ्रन्ट रनर मे राजस्थान कर्नाटक आदि प्रदेषों ने स्थान प्राप्त किया है। स्टेट एनर्जी एफिशिएंसी इन्डेक्स 2020 जारी करते हुएं देश के सभी राज्यो की ऊर्जा दक्षता एवं बचत के कार्यो एवं उपायों के आधार पर रेंकिंग की गई हैं। स्टेट एनर्जी एफिशिएंसी इन्डेक्स 2020 हेतु भारत सरकार द्वारा देश के समस्त राज्यों को चार श्रेणियों मे विभाजीत किया गया। प्रथम श्रेणी मे फ्रन्ट रनर, द्वितीय श्रेणी मे अचीवर, तृृतीय श्रेणी मे कंटेंडर एवं चतुर्थ श्रेणी मे एस्परेंट राज्योें का चयन होता है।

दरअसल यह सब सरकारों की ईच्छा शक्ति पर निर्भर करता है। पिछले दिनों विद्युत संयत्रों के लिए देशव्यापी कोयला संकट आया और विद्युत संयत्रों को चलाने के लिए कोयले की कमी आई तो राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने दोहरे प्रयास किए। एक और स्वयं एसी का उपयोग नहीं करने का संदेश देने के साथ ही प्रदेशवासियों से बिजली की बचत करने का संदेश दिया तो दूसरी और प्रदेशवासियों को बिजली संकट का सामना नहीं करना पड़े इसके लिए प्रशासनिक स्तर पर प्रयास किए गए। इसका परिणाम भी देखने को मिला और राजस्थान के अतिरिक्त मुख्य सचिव डा सुबोध अग्रवाल ने प्रशासनिक स्तर पर केन्द्र व राज्य के बीच समन्वय व सामजंस्य बनाते हुए बिजली संकट के उस दौर का हल निकाला। हांलाकि यह सब जानते हैं कि एसी बंद करने से बिजली खपत पर कितना कम असर पड़ेगा पर यह अपने आप में एक संदेश का काम कर गया। मुख्यमंत्री स्वयं जब आगे आकर पहल करते हैं तो निश्चि रुप से एक संदेश जाता है और इसका जीता जागता उदाहरण राजस्थान है। राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में इसे उदाहरण के रुप में देखा जा रहा है। यह महत्वपूर्ण और संदर्भित भी इसलिए हो जाता है कि हमकों मौजूदा हालातों से संवेदनशीलता के सथ निपटना है तो भविष्य की रुपरेखा भी तय करनी है। यही कारण है कि गैरपरंपरागत ऊर्जा के क्षेत्र में राजस्थान निरंतर आगे बढ़ रहा है और इस साल तो उपलब्धियों की नई इबारत लिखने जा रहा है।

अब यह साफ हो जाना चाहिए कि देश दुनिया के सामने एक और ऊर्जा दक्षता और ऊर्जा बचत ही विकल्प है तो दूसरी और नवीकरणीय या यों कहें कि अक्षय ऊर्जा क्षेत्र में उत्पादन बढ़ाना आज की आवश्यकता हो गई है। समय की यही मांग है। अब हमारे पास बड़ा विकल्प हमारी हवा, धूप और बायोमास ही बनती जा रही है और इसका सदुपयोग ऊर्जा क्षमता विकसित करने में किस तरह से अधिक वैज्ञानिक तरीके से हो सकता है इस दिशा में अनुसंधान जारी रखना होगा ताकि कोयला या अन्य संसाधनों पर निर्भरता कम से कम हो सके।

डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा



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