जिन्हें ईसा से नफ़रत है,'मसीहाई' वह क्या जानें
| -Nirmal Rani - Dec 29 2021 2:52AM

-निर्मल रानी   

                                                                        मानव इतिहास में ईसा मसीह का नाम प्रत्येक धर्म व जाति के लोगों द्वारा अत्यंत सम्मान से लिया जाता है। ईसाईयों का एक वर्ग ईसा को ईश्वर मानता है और प्रभु यीशु मसीह कहकर संबोधित करता है तो दूसरा वर्ग उन्हें ख़ुदा का बेटा इसलिये कहता है क्योंकि उनका जन्म अविवाहित व पवित्र मां मरियम के पेट से ईश्वरीय चमत्कार से हुआ था। उधर मुसलमानों में भी ईसा को इसलिये पूरा सम्मान दिया जाता है क्योंकि मुस्लिम मान्यताओं के अनुसार धरती पर अवतरित होने वाले एक लाख चौबीस हज़ार पैग़म्बरों में ईसा भी एक थे। उन्होंने मुहम्मद साहब से पहले अवतार लिया था। धार्मिक मान्यताओं व विश्वासों से इतर ईसा मसीह धरती पर मानवता के लिये आदर्श मानव रूप में अवतरित हुये।

                                                                करुणा,क्षमा,प्रेम,सेवा,सत्कार,शिक्षा,ग़रीबों,निर्बल,दुर्बल,असहाय,बीमार व कुष्ठ लोगों की सेवा को ही वे सबसे बड़ा धर्म व कर्तव्य मानते थे। किसी परोपकारी अथवा उद्धार करने वाले को 'मसीहा' कहकर पुकारना ईसा के सेवा भाव का ही परिणाम है। आज भारत सहित पूरे विश्व में अनेकानेक शिक्षण संस्थान,अस्पताल,कुष्ठ रोगी अस्पताल,लावारिसों के लिये खुले 'होम्स' आदि तमाम लोकहितकारी संस्थायें व संस्थान इन्हीं 'ईसा '  के मानने वालों द्वारा संचालित किये जा रहे हैं जिसका लाभ ईसाई तो कम ग़ैर ईसाई ज़्यादा उठा रहे हैं। भारत में अकेली मदर टेरेसा ने ही लाखों ग़ैर ईसाई अपेक्षित,तिरस्कृत व प्रताड़ित लोगों को नया जीवन प्रदान किया। सेवा भाव में उनकी दूसरी मिसाल मौजूद नहीं। उनकी इन्हीं सेवाओं के लिये उन्हें भारत रत्न प्रदान किया गया था।                              

                                                                   परन्तु  हर समय आँखों पर संप्रदायवाद का चश्मा लगाये रखने वालों को मानवता के प्रति इनकी सेवा,इनका त्याग व बलिदान नज़र नहीं आता। इन्हें सिर्फ़ यह दिखाई देता है कि चूँकि यह ईसाई संस्थायें हैं लिहाज़ा यह सारी सेवायें लोगों का धर्म परिवर्तन कराने के लिये ही की जाती हैं। सांप्रदायिकता की नज़रों से हर चीज़ को देखने वाले इन लोगों को यह भी बताना चाहिये कि मिशनरीज़ द्वारा चलाये जा रहे इन्हीं स्कूल व कॉलेज से शिक्षित होकर निकले करोड़ों छात्रों में से अब तक कितने छात्रों ने धर्म परिवर्तन किया और मिशनरीज़ संचालित अस्पतालों से स्वास्थ्य लाभ पाने वाले कितने मरीज़ों ने धर्म परिवर्तन किया ? इन्हें ईसा से भी दुश्मनी है,माँ मरियम से भी और अब तो गत 25 दिसंबर को हमारे देश में आगरा में तोहफ़े बांटने के प्रतीक सेंटा क्लॉज़ का भी पुतला यह कहकर फूँक दिया गया कि 'धर्म परिवर्तन हेतु लालच देने के लिये सेंटा क्लॉज़ तोहफ़े बांटता है'। क्या पूरे विश्व में और इस परंपरा की शुरुआत से ही सेंटा क्लॉज़ धर्म परिवर्तन हेतु तोहफ़े बांटता है ? विश्व हिन्दू परिषद् के लोगों ने वाराणसी में भी सेंटा क्लॉज़ का पुतला फूंकने की योजना बनाई थी जिन्हें पुलिस ने नज़रबंद कर दिया क्योंकि पुलिस को कार्यक्रम की ख़बर पुतला दहन से पहले ही लग गई थी।

                                                                  गत 25 दिसंबर को तो हरियाणा का अंबाला जिला भी इन संप्रदायिकतावादियों की चपेट में आ गया। अंबाला ज़िले की गिनती आम तौर  पर देश के शांतिप्रिय ज़िलों में की जाती है। साम्प्रदायिक दंगों अथवा धर्म जाति आधारित नफ़रत अथवा संघर्ष का भी इस ज़िले अथवा शहर का कोई इतिहास नहीं है। परन्तु पिछले दिनों क्रिसमस के दिन अंबाला के इस शांतिपूर्ण वातावरण को न केवल अशांत करने का कुत्सित प्रयास किया गया बल्कि अंबाला को कलंकित भी कर दिया गया। अंबाला छावनी स्थित होली रिडीमर कैथोलिक चर्च के  बाहर लगी यीशु मसीह की मूर्ति को कुछ असामाजिक तत्वों ने खंडित कर दिया। 1843 में निर्मित यह चर्च अंबाला छावनी के सबसे प्राचीन भवनों में प्रमुख है। बताया जाता है कि 1948 में इटेलियन कैपुचिन की निगरानी में होली रिडीमर कैथोलिक चर्च का निर्माण किया गया था। अंबाला के इतिहास की इस तरह की यह पहली घटना है जिसकी वजह से यहां रहने वाले ईसाई समुदाय के लोगों में अपने व अपने धर्मस्थलों की सुरक्षा के प्रति चिंता को बढ़ा दिया है।

                                                                 देश के अनेक राज्यों में चर्च में तोड़ फोड़ करने,आगज़नी करने,ईसा मसीह व मरियम की मूर्तियों को खंडित करने के समाचार अक्सर आते रहते हैं। जिन शिक्षिकाओं द्वारा मिशनरीज़ स्कूल्स में शिक्षा दी जाती है,जिन्हें नन्स  के नाम से जाना जाता है उनके साथ बलात्कार करने तक की दुःखद व शर्मनाक ख़बर सुनी जा चुकी है। क्या कोई धर्म यही सिखाता है कि जो हमारे बच्चों को शिक्षित कर आत्मनिर्भर बनाये उसका इस आरोप में बलात्कार किया जाये कि वह धर्म परिवर्तन कराती है ? 1999 में ओड़िसा के मनोहरपुर क्षेत्र में इन्हीं क्रूर सांप्रदायिक शक्तियों द्वारा ऑस्ट्रेलियन मिशनरी ग्रहम स्टेंस व उनके दस वर्षीय पुत्र फ़्लिप व छः वर्षीय पुत्र टिमोथी, तीनों को सोते समय उन्हीं के वाहन में ज़िंदा जला दिया गया था। उस समय भी पूरी दुनिया में देश की बहुत बदनामी हुई थी। आज उसी मनोहरपुर के लोग प्रतिदिन ग्रहम स्टेंस व उनके बच्चों की याद में शोक मनाते आ रहे हैं।

                                                              भारत,पाकिस्तान,बांग्लादेश,अफ़ग़ानिस्तान जैसे कई देश हैं जहां सक्रिय सांप्रदायिकतावादी शक्तियां जो स्वयं किसी का कल्याण नहीं कर सकतीं,जिन्हें दया करुणा प्रेम,अहिंसा,सहयोग,परोपकार पर नहीं बल्कि नफ़रत,हिंसा,क्रूरता पर यक़ीन है वही लोग किसी भी धर्म के किसी भी आराध्य अथवा महापुरुष के दुश्मन बने बैठे हैं। नफ़रत,वैमनस्य संभवतः इनके संस्कारों में शामिल है। अन्यथा मंदिर-मस्जिद-चर्च व गुरुद्वारों ने बनाने के सिवा किसी का बिगाड़ा ही क्या है ? यह धर्मस्थल व महापुरुष हमेशा से संपूर्ण मानवता के लिये प्रेरणादायी रहे हैं। किसी भी धर्म का सच्चा अनुयायी अपने दिल में किसी भी धर्म के किसी भी धर्मस्थल अथवा महापुरुष के प्रति बैर नहीं रख सकता। भारतवासियों का विशेषकर यह स्वभाव है तभी तो यह देश पूरी दुनिया में अनेकता में एकता का प्रतीक समझा  जाता है। परन्तु जिन्हें जिन्हें ईसा से नफ़रत है, मसीहाई वह क्या जानें।                                                              



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