नोटों की माला, सैफई महोत्सव और भगवा के जंग में जनता किसके संग?
| -RN. Feature Desk - Jan 18 2022 3:35AM

-बांकेलाल निषाद

डॉक्टर भीमराव अंबेडकर के लोकतांत्रिक विचारधारा मान्यवर कांशीराम के दलित प्रेम की दुहाई देकर बूआजी व डॉक्टर राम मनोहर लोहिया के समाजवादी विचारधारा की समाजवादी पहियों को आगे बढ़ाकर उत्तर प्रदेश की आम अवाम का उत्तरोत्तर विकास का तिलस्मी का सपना  दिखाकर उत्तर प्रदेश के राजनीतिक अखाड़े में कभी बूआ तो कभी बबुआ /भाई जी की सरकार का स्वाद  उत्तर प्रदेश की जनता ने चखा है और इन सरकारों में  मुख्यमंत्री रहते बूआ जब चमचमाती सुसज्जित राजनीतिक मंच पर अपने चिर-परिचित अंदाज में करोड़ों रुपयों की नोटों की माला अपने पाले हुए वफादार कैबिनेट मंत्रियों के हाथों पहनती थी तो उस समय अंबानी बंधुओं की तिजोरियां भी शर्मशार हो जाया करती थी और बाबा भीमराव अम्बेडकर व मान्यवर कांशीराम के सपनों में ग्रहण लगता दिखाई देने लगता था ।

बुआ जी से कम बबुआ/ भाई जी की सरकार भी सावन से भादों दूबर नहीं था वे भी जब बालीवुड की सुंदर बालाओं के साथ सैफई महोत्सव में मदमस्त होते थे तो उस समय इन्द्र दरबार की रौनक भी फीका पड़ने लगता था और डाक्टर राम मनोहर लोहिया की समाजवादी विचारधारा भी सुंदर बालाओं के घुंघरू के खनक पर थिरकने लगता था।  बहिन जी की चाहे नोटों की माला हो या भाईजी / बबुआ की सैफई महोत्सव इनसे आम अवाम का कोई सरोकार नहीं था या यूं कहें कि जनता को इन कार्यक्रमों से चिढ़ के अलावा सरकार के प्रति कोई हमदर्दी नहीं थी जनता के अंदर इनके प्रति दूरियां बढ़ती चली गई और इन्हें मालुम तक नहीं चला । इतना ही नहीं बूआ सरकार में अधिकारियों पर कोई नकेल नहीं था बहिन जी उन्हे सिरफिरों की तरह जनता का टेंटुआ दबाकर उनका ख़ून चूसने के लिए स्वतंत्र छोड़ दिया था और बोरा का बोरा रूपए जनता के बटुआ से इन सिरफिरे अधिकारियों द्वारा जबरदस्ती निकाल कर समय समय पर बहिन जी को पहुंच जाया करता था जिसे देख सुनकर जनता अपने आप में जल भुन मरती थी या यूं कहें कि बदला लेने की तलाश में थी ।

बहिन जी के कोआर्डिनेटरों वा कार्यकर्ताओं ने भी कोई कसर नहीं छोड़ी थी जब ये नीले गमछे को गले में डालकर क्षेत्र में जनता के सुख-दुख में शरीक होने के बजाय थानो तहसीलों व अधिकारियों/ कर्मचारियों के दफ्तरों में बैठकर जनता के फायदे के बजाय अपने फायदे की बात करते थे तो उत्तर प्रदेश की आम अवाम के बदनसीबी देखते ही बनता था । डॉक्टर भीमराव अंबेडकर की लोकतांत्रिक विचारधारा और मान्यवर कांशीराम का दलित प्रेम अपने आप में ठगा महसूस करता था । कभी जनता सैफई महोत्सव से ऊबती तो नोटों की माला को और नोटों की माला से ऊबती तो सैफई महोत्सव को बारी बारी से सरकार बनाकर अपने सपने को साकार करने में लगी रहती थी । लेकिन कोई सावन से भादों दूबर नहीं था सबके सब बड़े मियां बड़े मियां छोटे मियां सुभान अल्लाह की तरह कम नहीं निकले । सैफई महोत्सव के कार्यकाल में मुस्लिम तुष्टिकरण परिवारवाद यादव वाद बाहुबलियों का चारो तरफ बोलबाला हो गया ।

सैफई महोत्सव के कार्यकर्ता जब बहोरी बटोर कर थाना कचहरी चौराहे पर बैठकर यदुवंश चालीसा बांचते थे और लाल झंडा चमचमाती गाड़ियों में लगाकर हूटर बजाते सरकारी दफ्तरों से गुजरते थे तो उस समय आम अवाम की सांसें थम जाया करती थी। इनके मुस्लिम तुष्टीकरण बाहुबली यदुवंशी चालीसा और लाल झंडा डॉ राम मनोहर लोहिया के समाजवाद को ताक पर रखकर आम आवाम से कोई सरोकार नहीं रखता था। नोटों की माला और सैफई महोत्सव के शाहे बेखर सरकार से त्रस्त जनता के नब्ज को पहचानने में भगवा धारियों को देर नहीं लगी । एडवांस बैकवर्ड जाति के खिलाफ मोस्ट बैकवर्ड जाति को साथ लेकर एडवांस दलित जाति के खिलाफ अति पिछड़ी दलित जातियों को साथ लेकर भगवा धारियों ने चक्रव्यूह रचना शुरू किया । अच्छे दिन आने वाले है की बू दिल्ली से  प्रसारित हो चुकी थी दिल्ली के फकीर की दाढ़ी अभी बढ़ी नहीं थी मन की बात जोरों पर थी युवाओं के खाते में 15 लाख का सपना अभी धूमिल नहीं पड़ा था दिल्ली के माध्यम से उत्तर प्रदेश की आम अवाम को सुकून की सांस लेने का अवसर मिला और झूठ फरेब के विज़न के चकाचौंध में सत्ता उत्तर प्रदेश की जनता ने ऊबकर खाकी हाफ पैंट वालों को सौंप दिया। उत्तर प्रदेश में योगी युग आरंभ हुआ। उत्तर प्रदेश की जनता भगवा से बड़ी उम्मीद के साथ समझौता की थी।

भगवा का पांच वर्ष का सफर पूरा होने को है। आरक्षण जो मोस्टबैकवर्ड का मुख्य मुद्दा था जिनकी रीढ़ पर भगवा लहरा रहा है उन्हें तो नहीं मिला बल्कि 72 घंटे के अंदर सामान्य वर्ग को 10% का आरक्षण मिल गया । भगवा अपने बेस वोटों को जो कम पढ़े-लिखे भोले भाले मोस्ट बैकवर्ड और और ललुआ समाज अति दलित जातियां हैं इन्हें इनकी जरूरत की चीजों को जैसे शिक्षा स्वास्थ्य बेरोजगारी आरक्षण आदि की समस्या को ताक पर रखकर इन्हें भावनात्मक मुद्दों से जोड़ने का भरपूर प्रयास किया । दिल्ली के सहयोग से अयोध्या में भगवान राम मंदिर के ऐतिहासिक फैसले को महिमा मंडित कर इनके अंदर हिंदुत्व की भावना को इंजेक्ट करना , गौ माता को ईष्ट मानकर गौशाला निर्माण कर उन पर अकूत धन खर्च इनके हिंदू हित की दुहाई देना और करोड़ों कांवरियों के जत्थों को भगवा वोट में तब्दील करने के उद्देश्य से जिसमें अधिकतर मोस्ट बैकवर्ड के लोग और अति पिछड़ी दलित जातियां शामिल हैं उन पर हेलीकाप्टर से फूल वर्षा कर उनके स्वागत के नाम पर उनमें जबरदस्ती हिंदुत्व को ठूंसना ये सब कारनामे उनके साथ धोखा है । इनकी आरक्षण क्षुधा को शांत करने के बजाय इनको धार्मिक नशे की गोलियां दी जा रही है।

इन भोली-भाली अशिक्षित और बेरोजगार ललुआ समाज को मुफ्त में राशन देकर तेल नमक शौचालय/आवास देकर हिंदू -मुस्लिम व धार्मिक भावना भड़का कर इनकी वास्तविक पात्रता से इन्हें वंचित कर दिया जा रहा है। इनको सैफई महोत्सव और नोटों की माला की सरकारों की तरह इनके और इनकी आने वाली पीढ़ियों के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है। इनके सपनों को कुंद करके इनको भावनात्मक मुद्दों से जोड़ कर इन्हें भगवा की कसौटी पर कसा जा रहा है। वर्तमान में इन्हें अपना कहने वाली और इनके हक और अधिकार की लड़ाई लड़ने के लिए समेत सभी दल बांह बटोरे हैं । भगवा के खिलाफ भड़का कर और इनको अपना कहते- कहते कई राजनैतिक पहलवान पैदा हो गये हैं । चाहे डाक्टर संजय निषाद हो,मुकेश साहनी,बाबू सिंह कुशवाहा या ओम प्रकाश राजभर ये सभी का अभ्युदय इन्हीं के हक और अधिकार की लड़ाई लड़ते लड़ते हुआ है। इनमें डाक्टर संजय निषाद भगवा में ही रहकर इनके हक और अधिकार दिलाने की कसमें खाई थी लेकिन अभी हाल ही में रमा बाई पार्क में पूरे प्रदेश के निषाद डाक्टर संजय निषाद अमित शाह और योगी आदित्यनाथ की अगुवाई में आरक्षण के नाम पर इकट्ठा हुए थे ।पर उन्हें आरक्षण के नाम पर राजनैतिक झुनझुना ही हाथ लगा और वे कुर्सी तोड़कर अपने आप में संतुष्ट होकर लौट आये। हालांकि उत्तर प्रदेश की बची 15% की जातियां न इनकी कोई पार्टी है और न ही इनकी कोई सिद्धांत ।

इनकी बिरादरी के कंडीडेट जिस पार्टी से लड़ते हैं ये उसी पार्टी के हो जाते हैं इसलिए इनके हिसाब से सत्ता किसके हाथ में होगी अनुमान लगाना मुश्किल है। इन्हीं के ढर्रे पर कुछेक एडवांस बैकवर्ड और एडवांस दलित जातियां भी चलने लगी हैं और इन्हीं के संख्या बल के आधार पर पार्टियां भी टिकट दे रही हैं। उत्तर प्रदेश की इन अग्रणी जातियों पर हिंदू-मुस्लिम मंदिर -मस्जिद और धार्मिक भावना का कोई फर्क नहीं पड़ता। ये वोटिंग सिर्फ अपने बिरादरी के हित पर करते हैं । अब जो बची मोस्ट बैकवर्ड और अति दलित जातियां यही 2014 2017 2019 में सबसे बड़े हिंदू हैं सबसे बड़े धार्मिक हैं और सबसे बड़े राष्ट्रवादी । जबसे इनके अंदर हिंदुत्व और राष्ट्रवाद की भावना जागी है तब से केंद्र और राज्य में भगवा दिखाई दे रहा है और हो सकता है बाइस में भी दिखाई दे। जब तक ये अपनी जातीय हित को छोड़कर राष्ट्रवाद हिंदुत्व के नशे में हैं तब तक इनके कंधे पर हथियार रखकर पार्टियां अपनी अपनी दुकान चलाती रहेंगी और जब ये जागेगी तब पार्टियों का सोशल इंजीनियरिंग बिगड़ेगी। अब ये बाइस में जागेंगी या चौबीस में यह अभी समय के गर्भ में हैं

-बांकेलाल निषाद

जिलाध्यक्ष- इंडियन कौंसिल ऑफ प्रेस, निवासी- ग्राम डीह भियांव, तहसील जलालपुर, जनपद- अम्बेडकरनगर। 

शैक्षिक योग्यता- एम ए, बीएड इलाहाबाद विश्वविद्यालय इलाहाबाद, फोन नंबर- 6393332882, 9598918518



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