अगले साल उत्तर प्रदेश उत्तराखंड और पंजाब सहित पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं और इसी के मद्देनजर सभी दलों ने चुनावी तैयारी की अपनी पुरजोर कोशिशें शुरू कर दी है। प्रधानमंत्री का उत्तर प्रदेश में सियासी दौरे ने अन्य राजनीतिक दलों में हलचल पैदा कर दी है। धर्म और आस्था से लोगों को जोड़कर उन्हें अपने साथ जोड़ने की कोशिश जारी है, अयोध्या, काशी इसका उदाहरण है। लगभग सभी दलों को अब आम आदमी की चिंता सताने लगी है और उन्हें वादों में मुफ्त बिजली, पानी, सस्ता अनाज, तेल, गैस, फोन और लैपटॉप जैसी चीजों से लुभाने की कोशिशें शुरू कर दी गई है।
उत्तर प्रदेश के राजनीतिक गलियारों में पूर्वांचल विशेष महत्व रखता है। ऐसा कहा जाता है कि पूर्वांचल ने जिसका साथ दिया उसी पार्टी ने उत्तर प्रदेश में सत्ता का सुख भोगा है। विकास के तौर पर चुनावी माहौल में उत्तर प्रदेश को सौगातें दी जा रही हैं। गोरखपुर में एआईआईएमएस के साथ खाद फैक्ट्री, बलरामपुर में सरयू कनाल प्रोजेक्ट, काशी विश्वनाथ कॉरिडोर, शाहजहांपुर में गंगा एक्सप्रेस वे और प्रयागराज में मातृशक्ति महाकुंभ में महिलाओं को कई सौगातें दी गई। ये सारे प्रयास मतदाताओं को अपने हक में करने और चुनावी रणनीति के तहत ही है।
हालांकि इस चुनावी रणनीति में भाजपा के अलावा और कोई दल मजबूत नजर नहीं आ रहा। विपक्ष प्रयास जरूर कर रहा लेकिन सशक्त हमलावर नहीं हो पा रहा है। राजनीतिक गलियारों में मतदाताओं को लेकर जो ध्रुवीकरण चल रहा है उसमें बीजेपी कितनी सफल होगी यह अभी गर्भ में है।
अखिलेश यादव पूरी मजबूती से हमलावर हो रहे हैं और उन्हें अल्पसंख्यकों का वोट बिना प्रयास के ही हासिल है। इससे इतर भाजपा से ब्राह्मण वर्ग नाराज है। अल्पसंख्यकों का कितने प्रतिशत मत मिलेंगे इसमें भी संशय है फिर बेरोजगारी, महंगाई, अपराध, पेट्रोलियम, बढ़ती जीडीपी, गिरता रुपया और कोरोना ऐसे मुद्दे हैं जिस पर सरकार बुरी तरह से घिरी हुई है। फिर भी विकल्प के तौर पर अभी भाजपा के अलावा और कोई नहीं है, क्योंकि बाकी दलों में संगठन की कमी और मुद्दों पर पकड़ नहीं है।
कांग्रेस चुनींदा सीटों पर ध्यान दे रही है। इसके पीछे दो लक्ष्य हैं। इस चुनाव में भाजपा विरोधी मत बंटें नहीं और 2024 तक उसका संगठन इस लायक तैयार हो कि वह लोकसभा चुनाव में सीधे भाजपा को चुनौती देने और सपा को समर्थन में खड़ा होने को मजबूर करे।
बसपा अब भी यूपी में एक बड़ी ताकत है, लेकिन उसके परंपरागत दलित वोट पर भाजपा और कांग्रेस दोनों ने सेंध लगाई है। पश्चिम उसके आधार को चंद्रशेखर आजाद की भीम आर्मी से चुनौती मिल रही है। बसपा इससे बेफिक्र भाजपा से नाराज ब्राह्मण वोटों को साथ जोड़ने के लिए पार्टी महासचिव व सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता सतीश चंद्र मिश्र को आगे कर अभियान चला रही है। राजनीतिक विश्लेषकों के बीच यह आम धारणा बन रही है कि कांग्रेस सपा व बसपा भाजपा की बी टीम बनकर एक दूसरे के विरोधियों के वोट काटने के लिए सक्रिय हैं।
यह सवाल भी उठ रहा है कि प्रियंका लखीमपुर कांड के बाद से खामोश हैं। मायावती क्यों चुनाव कैंपेनिंग में नहीं उतर रहीं। बसपा नेताओं के घर ईडी व आयकर के छापे क्यों नहीं पड़ रहे। इसीलिए माना जा रहा है कि अंदरखाने के समीकरण तय हो चुके हैं और विपक्ष जहां सपा के पक्ष में लामबंद हो रहा है वहीं बसपा सहित अन्य छुटभैये दल भाजपाई खेमा पकड़ रहे हैं।
-प्रियंका वरमा माहेश्वरी, गुजरात