केवल और केवल एक साल की अवधि में ही अमेरिकी राष्ट्र्पति बाइडन की लोकप्रियता में तेजी से गिरावट देखने को मिल रही है। एक सर्वे के अनुसार केवल और केवल मात्र 11 प्रतिशत अमेरिकी बाइडन के कार्यकाल को एक्सीलेेंट की श्रेणी में रख रहे हैं तो 37 फीसदी लोगों ने पूरी तरह से विफल राष्ट्र्पति माना है। एक समय था जब बड़ बोले डोनाल्ड ट्रंप का विवादों से स्थाई नाता माना जाता था पर बाइडन के पिछले एक साल के कार्यकाल का विश्लेषण करने पर निराशा ही देखने को मिल रही है। दरअसल बाइडन को सबसे अधिक अलोकप्रिय बनाने में अफगानिस्तान को तालीबान के हबाले करने का निर्णय माना जाता है। माना जाता था कि बड़बोले डोनाल्ड ट्रंप की तुलना में बाइडन अच्छे राष्ट्रपति सिद्ध होंगे पर जो एक कुषल प्रषासक और देशहित में कठोरतम निर्णय लेने की आषा बाइडन से अमेरिकी लगाए बैठे थे उन्हें निराषा ही हाथ लगी है।
सर्वे के अनुसार तो अब उपराष्ट्र्र्पति कमला हैरिस की लोकप्रियता भी लगातार कम हो रही है। कारण साफ हैं पिछले एक दषक से लोगों की मानसिकता में तेजी से बदलाव देखने को मिल रहा है। इस दशक के लोगोें को गांधी नहीं अपितु कठोर कदम उठाने वाले हिटलर जैसे व्यक्तित्व की जरुरत हो गई है। आज दुनिया के देशों में एक नजर घुमा कर देखेंगे तो कठोर निर्णय लेने वाले राष्ट्राध्यक्ष को हाथोंहाथ लिया जा रहा है। राष्ट्र्वाद तेजी से फैला है। बल्कि यह कहो तो अधिक सही होगा कि आज अतिराष्ट्रवाद का युग देखा जा रहा है। इसका एक बड़ा उदाहरण तो हिन्दुस्तान में ही देखा जा सकता है कि भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को दुनिया के देषों में उनके कठोर निर्णयों के कारण जाना जाने लगा है। कोई यह देखने की फुरसत नहीं रखता कि परिणाम क्या आ रहे हैं अपितु निर्णय लेने की क्षमता के कारण जनता का यह सोच बनता जा रहा है कि कम से कम निर्णय लेने की क्षमता तो हैं।
अमेरिकी राष्ट्र्पति बाइडन से नाराजगी का एक बड़ा कारण अफगानिस्तान से सेना की वापसी है। अमेरिका ही नहीं अपितु दुनिया के अधिकांश देशों को अमेरिका का यह निर्णय लौट के बुद्धू घर को आए जैसा हो गया है। आज अमेरिका के इस निर्णय से तालीबानी विस्तारवादी ताकतों को मजबूत होने का अवसर मिला है तो दूसरी और अफगानिस्तानी नागरिक तालीबान के रहम कर्मों पर आ गए हैं। न्यूजविक जैसे अखबार ने बाइडन की एपुूवल रेट में एक साल में ही इतनी अधिक कमी पर चिंता व्यक्त की है। अफगान नीति की विफलता या यों कहें कि अफगानिस्तान नीति में गलती किसी ने की हो पर सेना की वापसी से अमेरिकी और दुनिया के देश सभी हताश हुए हैं। आज अति राष्ट्रीयता का युग चल रहा है और शांति या सद्भावना की बात दूर की बात होती जा रही है।
सारी दुनिया पिछले दो सालों से कोरोना के नित नए वैरियंट से दो चार हो रही है। कोरोना की पहली लहर हो या दूसरी या तीसरी जिस तरह से अमेरिका में संक्रमण और मौत का सिलसिला चला उससे भी बाइडन की छवि पर विपरीत प्रभाव पड़ा है। पिछले एक साल में कोरोना से निपटने में भी बाइडन प्रशासन को विफल माना गया है। हांलाकि कोरोना विष्वव्यापी महामारी है और भारत जैसे देश तीसरी लहर से दो चार हो रहे हैं। ओमक्रान का असर जिस तरह से देखा गया उससे भी अमेरिकीयों में निराशा ही देखी गई है। कोविड के कारण सारी दुनिया की अर्थव्यवस्था प्रभावित हुई है। इसमें दो राय भी नहीं हो सकते पर महंगाई पर नियंत्रण नहीं होना भी बाइडन की विफलता का एक कारण माना जा रहा है। और भी ऐसे अनेक कारण है जिससे बाइडन का ग्राफ लगातार डूबकी लगाए जा रहा है।
दरअसल राष्ट्रपति बाइडन ने पिछले साल 6 जनवरी को दिए एक संबोधन में कहा था कि मैं राष्ट्र्पति पद की शक्ति में विश्वास रखता हूं और उसका उद्देष्य देष को एकजुट करना है। दरअसल इस संबोधन पर बाइडन खरे नहीं उतरे हैं। यह अमेरिकीयों का मानना है। अफगानिस्तान पर निर्णय से कहीं ना कहीं अमेरिका की शक्तिशालिता पर प्रश्न उठा है तो लोगों में निराषा ही आई है। एक शक्तिशाली देश जिस तरह से किसी देश को अपने रहमों कदम पर छोड़ आया है वह विश्वसनीयता पर प्रश्न उठाता है। इससे चीन और रुस को भी एक संदेश गया है और वह अमेरिका के एक छत्रता में कमी का संदेश है।
हालात सामने हैं। सर्वें रिपोर्ट्स चेताने वाली है तो डेमोक्रेट्स में निराशा भी आ रही है। अमेरिका के वर्चस्व में कमी साफ दिखाई देने लगी है। आखिर राष्ट्रवादिता के युग में कठोर निर्णय लेने वाले व्यक्ति की छवि कुछ और ही होती है। अफगानिस्तान का निर्णय मैदान छोड़ कर भागने जैसा निर्णय मानते हैं अमेरिकी और यही कारण है कि लोगों में बाइडन से निराशा हुई है। अभी तो पूरे पूरे तीन साल का समय है। लोगों की धडकन को देखकर बाइडन को अपनी छवि में सुधार लाना होगा तो प्रबंधन और निर्णय के क्षेत्र में अपनी छवि छोड़नी होगी। लोग परिणाम से उतने प्रभावित नहीं होते जितने निर्णय से होते हैं।
-डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा