143 वर्षीय हो गया भारतीय पोस्ट कार्ड

143 वर्षीय हो गया भारतीय पोस्ट कार्ड

- मनीष निमाड़े 

लाखो करोड़ो परिवारों की खुशियाँ ,प्रेम,स्नेह,ओर सुख दुःख  के संदेशो का वाहक रहा हमारा पोस्ट कार्ड जिसने परिवारों को सदा जोड़ा हि है । आज हमारा *भारतीय पोस्ट कार्ड*  143 वर्ष का हो गया है सदियों पूर्व आरम्भ सफर से आज  के आधुनिकतम युग ने भी इसका हमारे बिच होना इसकी महत्ता ओर उपयोगिता को दर्शाता है ।

अत्यधिक तेजी से दौड़ती भागती जीवन शैली मे आधुनिक संचार प्रणाली इंटरनेट के आ जाने से सूचना ,संदेश, हालचाल पाने ओर देने की गति दुगनी हो गई ओर इन सभी मे व्हाट्सएप, ईमेल,ट्वीटर,एस एम एस,इंस्टा,फेसबुक चैट की भूमिका प्रमुख हो गई है  किन्तु एक दौर था जब शान्ति से बैठ तोल मोल कर ग़ुढ प्रभावी अपने शब्दों को एहसास,प्रेम,अपनत्व रूपी श्याही से "पोस्ट कार्ड" पर लिख अपने प्रियजनों को भेजा जाता था ओर नजाने कितने घरों मे अधीरता से पोस्ट कार्ड की बाट  जोही जाती थी । कई बार तो डाकिया के हाथो मे कार्ड देख कर हि घर के लोग खुशी से झूम जाते तो कभी फुट फुट कर बिलख पड़ते थे ।क्युकी कुमकुम रोली लगा कार्ड खुशियों का ओर कोना फटा कार्ड दुःख की सूचना का घोतक होता है ।

मोट आयताकार गत्ते के टुकड़े के अलावा लकड़ी,ताम्बा,कपड़ा,नारियल,चमड़े आदि से निर्मित भाँती भाँती के पोस्ट कार्ड का प्रचलन हुवा था । कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी की पोस्ट कार्ड ने जैसा देश वैसा भेष बना लिया ।रूप रंग आकार बदलते हमारे पोस्ट कार्ड की सुंदर ओर अविस्मरणीय यात्रा को अस्तित्व मे लाने का विचार सर्वप्रथम आष्ट्रीयाई प्रतिनिधि कोलबेस्टिनर के मानस पटल पर 01 जुलाई 1869 को आया था । इस बारे मे उन्होंने विनर न्योस्टन मे सैन्य अकदमी मे अर्थशास्त्र के प्रोफ़ेसर डॉ एमेन्यूल हमेंन को बताया उन्हे भी यह विचार अत्यधिक रोचक लगा ओर 26 जनवरी 1869 को स्थानीय समाचार पत्र मे इस सम्बन्धी लेख लिखा ।

आष्ट्रीया के डाक मंत्रालय ने इसपर त्वरित कार्य किया ओर पोस्टकार्ड की पहली प्रति 01 अक्टूबर 1869 मे जारी की गई ,यही से पोस्टकार्ड की सुखद रोमांचक यात्रा आरम्भ हुई जिसे विश्व ने हाथो हाथ लिया।

पोस्टकार्ड का जितना सिमित आकर आज दिखता है उससे कई गुना अधिक इसकी असिमित कहानी है । प्रत्येक देश के साथ पोस्ट कार्ड की अपनी  कहानी है इसे गूगल पर पोस्टकार्ड विकी पीडिया आदि से जाना जा सकता है ।हम अपने भारत वर्ष की बात करे तो 01 जुलाई 1879 का वह प्यारा सा दिन था जब पोस्टकार्ड का चलन हमारे देश मे आरम्भ हुवा ।यूँ तो पहला पोस्ट कार्ड पिलेरंग का जन्मा था । किन्तु भारत मे इसका नविन रूप हलके भूरे रंग का हुवा करता था जिसपर इस्ट इंडिया छपा था बिच मे ग्रेट ब्रिटेन का राजचिन्ह मुद्रित था ओर ऊपर की तरफ दोनो कोनो मे लाल भूरे रंग मे तसज पहने महारानी विकटोरिया की मुखकृति छपी थी ।बाद मे पोस्टकार्ड मे बदलाव आते रहे किन्तु  इसके पसंद करने वालों की कनि नहीं रही ।

जब किसी अपने सम्बन्धी को डाक शुल्क के भार से मुक्त रखते हुवे उत्तर प्राप्त करना होता था तो कार्ड के साथ जुड़ा हुवा जवाबी कार्ड पर अपना पता लिख भेजा जाता था । भारत मे मात्र 03 पैसे के दाम वाला पोस्ट कार्ड 143 वर्ष की लम्बी यात्रा के बाद भी सामान्य मूल्य 50 पैसे हि है ।

14 सेमी लम्बा ओर 09 सेमी की चौड़ाई वाले पोस्ट कार्ड की जानकारी हमे भारतीय डाक सेवा की वेबसाइट पर सर्च करने से तिन प्रकार के पोस्टकार्ड उपलब्ध होते है ,एक सामान्य पोस्टकार्ड, दूसरा प्रिंटेड पोस्ट कार्ड ,ओर तीसरा मेघदूत पोस्ट कार्ड दिखता है ।

हमारे देश मे आज भी आम जन मानस कोई विशेष मांग सुझाव आदि हेतु प्रदानमंत्री को पोस्टकार्ड लिख अपनी मनुहार करते जनसमर्थन देते है विश्व के सबसे विशाल परिवार यानी रेडिओ श्रोता आज भी पोस्ट कार्ड का उपयोग अपनी पसंद के कार्यक्रमों मे गीत सुनवाने का निवेदन करते है तो अच्छे कार्यक्रमों की प्रशंशा ,समीक्षा ओर सुझाव,शिकायत लिखते है। यही बात वे समाचार पत्रों के लिए भी पोस्टकार्ड के माध्यम से भेजते है ।

पोस्टकार्ड के अध्ययन ,संग्रहण की विधा को आज डेल्टियोलोजी कहा जाता है । पोस्ट कार्ड के उलाहने किस्से आज भी मन को भवविभोर कर देते है "अरे भाई दस पैसे का पोस्ट कार्ड हि डाल देते " या फिर विवाह पश्चात दूर गाँव,शहर की बेटी को जब अपनी माँ का लिखवाया गया कार्ड मिलता था तो उसे यूँ लगता था मानो कार्ड मे माँ समाई हुई है , अनपढ़ माँ न जाने किस किस से मनुहार कर कार्ड लिखवाती थी तो वही बेटी के ससुराल से आया कार्ड छोटे भाई बहन ओर माँ के लिए अनमोल हुवा करता था । पोस्टकार्ड को माँ अपनी छाती से यूँ लगा लेती थी मानो पोस्टकार्ड मे बेटी समाई हुई है ।

अपनों के दिवंगत हो जाने का समाचार कार्ड ने सदैव देरी से हि पहुंचाया  जिसका कोना फटा होता था ओर इसे कभी भी घर मे प्रवेश नहीं मिला वही पोस्टकार्ड प्रेमियों के हाथ मे कभी नहीं चढ़ा किन्तु दोस्ती का दमन सदैव थामे रखा था ।

लाखो लाख किस्से इससे जुड़े हुवे है । समय के साथ बदलना आवश्यक है किन्तु अपने मे भी बदलाव कर अपना अस्तित्व बचाये रखना महत्वपूर्ण है ।  आज भारतीय पोस्टकार्ड 143 वे जन्म दिवस पर इसे पसंद करने वालों के साथ आप सभी को हार्दिक बधाई ।

आत्याधुनिक तीव्रगामी, त्वरित उत्तर प्राप्ति वाली इंटरनेट सेवा के चलते पोस्टकार्ड का चालन बहुत कम हो गया ( इसके साथ पत्र लेखन की विधा भी अस्ताचल की ओर मुड़ गई है ) ओर पोस्टकार्ड अब अपनी अंतिम सांसे गिनराहा है किन्तु इस बस्त मे कोई शंशय नहीं की "अन्दज-ए-बया" का यह सबसे सस्ता ,सरल,सुखद माध्यम है । आज भी किसी अपने को पोस्ट कार्ड लिखिए ओर उनके साथ स्वयं भी सुखद अनुभूति का आनंद लीजिये ।


मनीष निमाड़े 


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