- Rainbow News Feature Desk
आज का युग धातुओं का युग है। इसलिए घरों में भी हम सभी अधिकतर धातुओं से बने बरतनों का ही उपयोग करते हैं। सच तो यह है कि आधुनिकता की चकाचौंध में और पाश्चात्य संस्कृति के रंग में रंगकर हम मिट्टी के बरतनों को लगभग लगभग बिसरा चुके हैं। आज घरों से मिट्टी के बरतन नदारद हैं और धातु के बरतनों का भंडार है। स्टील, एल्युमिनियम, तांबा, पीतल, कांसा,चांदी,लोहा आदि धातुओं के बरतन ही आज हमारे रसोईघरों में दिखते हैं। इनमें भी ज्यादातर हम स्टील, पीतल, तांबे,लोहे और एल्युमिनियम का ही उपयोग अधिक करते हैं। कांसे के बरतन,तांबे व पीतल,चांदी व लोहे जैसी धातुओं के बरतन भी कम ही घरों में आजकल दिखते हैं। हमारे घरों में एल्युमिनियम का उपयोग लगातार बढ़ रहा है, क्योंकि प्रेशर कुकर ज्यादातर इसी धातु के बने होते हैं और एल्युमिनियम धातु को स्वास्थ्य के लिए अच्छा नहीं माना जाता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि एल्युमीनियम के बर्तन भोजन के 80 प्रतिशत से ज्यादा पोषक तत्व समाप्त कर देते हैं। वैसे, बरतनों में चांदी, लोहा,पीतल, स्टील, कांसा सबसे अच्छे माने जाते हैं, इनमें भी कांसा और चांदी सबसे अच्छे होते हैं। कांसे के बरतन तो अब गांव घरों में ही पाये जाते हैं और युवा पीढ़ी तो इस धातु के बारे में ठीक तरह से जानती भी नहीं है। यदि हम यहाँ कांसा धातु की बात करें तो काँसा (संस्कृत कांस्य) संस्कृत कोशों के अनुसार श्वेत ताँबे अथवा घंटा बनाने की धातु को कहते हैं। विशुद्ध ताँबा लाल होता है; उसमें राँगा मिलाने से सफेदी आती है। इसलिए ताँबे और राँगे की मिश्रधातु को काँसा या कांस्य कहते हैं। इन सभी धातुओं के बीच आज हमारे घरों के रसोईघरों से जो चीज नदारद हो गई है, वह है मिट्टी से बने बरतन।
हमारी सनातन भारतीय संस्कृति हमेशा से महान थी और रहेगी भी, जहाँ ऋषि मुनियों ने जीवन जीने के उत्तम तरीके बताये थे जिससे ना केवल हमारी आयु बढ़ती थी, बल्कि हम हमेशा के लिए शारीरिक व मानसिक रूप से स्वस्थ भी रहते थे। उसी में से एक था हमेशा मिट्टी के बने बर्तनों में भोजन बनाना। किंतु समय के साथ-साथ हमारे ऊपर पाश्चात्य सभ्यता का प्रभाव बढ़ता गया व आजकल लगभग हर घर में एल्युमीनियम के बर्तनों में खाना बनाया व खाया जाने लगा हैं जो हमारे स्वास्थ्य के लिए बहुत अधिक हानिकारक हैं। आज घरों में धातुओं के बरतन के अधिक इस्तेमाल के कारणों में यह भी एक प्रमुख कारण है कि धातु से बने बर्तनों के टूटने का खतरा भी नही होता हैं जबकि मिट्टी के बर्तन गिरते ही टूट जाते हैं।
कुछ लोग इसे अपनी ख्याति से भी जोड़कर देखते हैं और सोचते हैं कि मिट्टी के बर्तनों में खाना पकाना निर्धन लोगों का कार्य हैं और यह कहीं न कहीं उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा से जुड़ जाता है। एक कारण यह भी है कि आज बड़ी बड़ी नेशनल व मल्टीनेशनल कंपनियों के द्वारा जो बर्तन बनाये जाते हैं वही बर्तन सभी को दुकानों, शॉपिंग माल्स, ऑनलाइन वेबसाइट पर आसानी से मिल जाते हैं व साथ ही उनमें कई तरह के डिजाईन भी मिलते जिस कारण लोग उन्हीं को खरीदने में अपनी रूचि दिखाते हैं।आज कोई अपने घर में मिट्टी से बने बरतन रखता है तो उसे पिछड़ा हुआ समझा जाता है लेकिन आपको जानकर हैरानी होगी कि मिट्टी के बरतन स्वास्थ्य की दृष्टि से सबसे अच्छे व बेहतरीन माने जाते हैं। आज भी बहुत से गांवों में दूध-दाल,सब्जी-भात,रोटी,चूरमा बनाने के लिए मिट्टी के बरतनों का उपयोग किया जाता है।
पानी पीने के मटके तो आपको प्राचीन प्याऊं में मिल जायेंगे। मिट्टी के बरतनों में पका खाना सेहत के लिए वरदान है। आज बड़े बड़े शहरों में लोग मिट्टी के बरतनों का खाना खाने के लिए विभिन्न रेस्टोरेंट, ढ़ाबों,होटलों में जाते हैं। आप देखिए कि आज तमाम बड़े बड़े तीन- पांच और सात सितारा होटलों में मिट्टी के बर्तनों में पका खाना बहुत स्पेशल माना जाता है। इसके लिए चार्जेज भी स्पेशल होते हैं। आज संसाधनों के अभाव में हम ऐसा करते हैं, गांवों में भी अब मिट्टी नहीं रही,आधुनिकता के चलते कुम्हार भी अब मिट्टी के बरतनों में कम ही रूचि दिखाते हैं, क्योंकि धातुएं आ गई हैं और कोई इन्हें खरीदता भी नहीं है। हमारे पास समय का भी अभाव है, लेकिन आज मिट्टी के बर्तन में बना खाना संसाधनों की कमी का नहीं बल्कि सम्पन्नता का प्रतीक है।
आज शहरों में कामकाजी महिलाओं के पास खाना बनाने के लिए अधिकतम एक घंटे का समय होता है, उसी में उन्हें कई कई किस्म का खाना बनाना होता हैं बल्कि साथ ही साथ सबके टिफिन पैक करने होते हैं और भागमभाग में यह भी ध्यान रखना होता है कि खाने ऐसे न हों जिसे खाते समय अतिरिक्त सावधानी बरतने की जरूरत पड़े। इसलिए आज जब खाना बनता है, उसमें स्वाद के साथ साथ समय और कहीं भी किसी भी तरह की स्थितियों में उसे खा लेने की सहूलियत शामिल होती है। मिट्टी के बर्तनों में खाना बनाने के लिए बहुत ज्यादा समय चाहिए। कई गुना ज्यादा एनर्जी चाहिए और इस खाने का लुत्फ उठाने के लिए बहुत ज्यादा समय चाहिए, जो कि इस भागदौड़ व धूप भरी जिंदगी में शायद किसी के पास नहीं है।
आपने महसूस किया होगा कि पहले लोग गांवों में बड़े चाव से मिट्टी के बरतनों में बना खाना खाते थे और कम बीमार पड़ते थे और सौ-सौ साल तक जीते थे, लेकिन आज ऐसा क्या हो गया है कि आदमी जल्दी जल्दी बीमार पड़ रहा है और पैंसठ-सत्तर की उम्र भी बमुश्किल पकड़ रहा है। आज प्राकृतिक चिकित्सक मिट्टी के बरतनों में खाना खाने के लिए हम सभी को सलाह देते हैं तो उसका प्रमुख कारण यह है कि मिट्टी के बरतनों में पकाये जाने वाला खाना विभिन्न औषधीय तत्वों से सरोबार रहता है, उसके पोषण तत्व हमेशा बने रहते हैं और वे जल्दी नष्ट नहीं होते। मिट्टी के बरतनों में बने खाने में भरपूर आयरन,फास्फोरस, कैल्शियम और मैग्नीशियम मौजूद होते हैं जो हमारे स्वास्थ्य को हमेशा अच्छा रखने में अपनी भूमिका निभाते हैं।
मिट्टी के बरतनों में छोटे छोटे असंख्य छिद्र होते हैं, जिससे उनमें पकने वाले भोजन को आग और नमी हर तरफ़ से बराबर मिलती रहती है। अधिक तेल व वसा को मिट्टी के बरतन कुछ हद तक सोख लेते हैं। याद रखिए कि मिट्टी के बरतनों में खाना पकता है, गलता नहीं है। हमारे शरीर को 18 प्रकार के सूक्ष्म पोषक तत्व चाहिए होते हैं जो मिट्टी के बर्तनों से नष्ट नहीं होते हैं। साथ ही मिट्टी में किसी भी प्रकार का रसायन या अन्य हानिकारण तत्व भी नहीं मिला होता है जिससे भोजन हमेशा ताजा व उत्तम ही रहता है। अन्य बर्तनों की अपेक्षा मिट्टी के बर्तन में खाना जल्दी से ठंडा नही होता क्योंकि मिट्टी अधिक समय तक गर्म रहती हैं व अंदर का तापमान भी जल्दी से नीचे नहीं गिरता। इसलिए मिट्टी के बर्तनों में पके खाने को फिर से गर्म करने की आवश्यकता नहीं पड़ती। भोजन को जब हम फिर से गर्म करते हैं तो उसके ज्यादातर पोषक तत्व खत्म हो जाते हैं जो मिट्टी के बर्तन में नहीं होता।मिट्टी के बर्तन की यह भी सबसे बड़ी उपलब्धि है कि ये हमारे भोजन को स्वास्थ्यवर्धक बनाने के साथ-साथ उसे हमारे लिए स्वादिष्ट व सुगंधित भी बनाते हैं। -सुनील कुमार महला
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