नई शिक्षा नीति से भारत गढ़ेगा भाषाओं के क्षेत्र में नये प्रतिमान।

नई शिक्षा नीति से भारत गढ़ेगा भाषाओं के क्षेत्र में नये प्रतिमान।



भाषा अभिव्यक्ति का सशक्त और शानदार माध्यम होतीं हैं और भारतीय भाषाएं अपने आप में सर्वोपरि हैं। हाल ही में भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने नेशनल एजुकेशन पालिसी(एनईपी) के तीन वर्ष पूर्ण होने पर अखिल भारतीय शिक्षा समागम के उद्घाटन कार्यक्रम के दौरान यह बात कही है कि छात्रों के साथ सबसे बड़ा अन्याय उन्हें उनकी क्षमताओं की बजाय उनकी भाषा के आधार पर आंकना है। हाल ही में 29 जुलाई 2023 को अखिल भारतीय शिक्षा समागम 2023 के उद्घाटन समारोह के दौरान प्रधानमंत्री ने शिक्षा जगत में होने वाले बड़े बदलावों पर चर्चा की है। 


उल्लेखनीय है कि पीएम मोदी ने अपने भाषण में कहा कि अब शिक्षा क्षेत्रीय भाषाओं में दी जानी है इसलिए पुस्तकें भी 22 भारतीय भाषाओं में भी होंगी। उन्होंने कहा है कि इसका एक और लाभ इस देश को होगा कि भाषा की राजनीति करके अपनी नफरत की दुकान चलाने वालों की दुकानें बंद हो जायेंगी और एनईपी(राष्ट्रीय शिक्षा नीति) से देश की हर भाषा को सम्मान और बढ़ावा मिलेगा। वास्तव में यह बहुत ही काबिलेतारिफ और महत्वपूर्ण है कि अब देश में ऐसी राष्ट्रीय शिक्षा नीति का आगमन हो चुका है जिससे देश की हर भाषा को उचित सम्मान और श्रेय मिल सकेगा। 


अब तक विभिन्न राजनीतिक दल भाषा के नाम पर अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकते रहे हैं, और अपना वोट बैंक पक्का करते रहे हैं,लेकिन अब उनकी दाल नहीं गल सकेगी। आज मातृभाषा में शिक्षा भारत में छात्रों के लिए न्याय के एक नये रूप की शुरुआत कर रही है। गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने एक बार यह कहा था, कि ‘भारतीय संस्कृति एक विकसित शत दल कमल की तरह है, जिसकी प्रत्येक पंखुड़ी हमारी प्रादेशिक भाषाएं हैं। किसी भी पंखुड़ी के नष्ट होने से कमल की शोभा नष्ट हो जाएगी। मैं चाहता हूं कि प्रादेशिक भाषाएं रानी बनकर प्रांतों में विराजमान रहें और उनके बीच हिंदी मध्यमणि बनकर विराजे।’ वास्तव में मातृभाषा किसी भी व्यक्ति विशेष के लिए केवल और केवल संवाद का जरिया या माध्यम ही नहीं होती है अपितु मातृभाषा वह सशक्त माध्यम होती है जिससे हमारी समृद्ध विरासत भी जुड़ी होती है। 


वास्तव में मातृभाषा का तिरस्कार अपने ऐतिहासिक ज्ञान , अपने देश की संस्कृति और गौरव को नष्ट करने के समान ही है। हमें यह बात अपने जेहन में रखनी चाहिए कि राष्ट्रीय एवं सामाजिक जागृति मातृभाषा प्रचार के बिना नहीं हो सकती है। सच तो यह है कि मनुष्य का मनोविकास अथवा विभिन्न मनोवृत्तियों का प्रसार मातृभाषा के द्वारा ही संभव हो सकता है। वह शक्ति केवल मातृभाषा में निहित है जो हमारे हृदय में छिपे हुए भावों, विचारों, उद‌्वेगों, अभिव्यक्ति और हृदय में छिपे रहस्यों को ठीक-ठाक रूप देकर शब्दों में ढाल सकता है। आजादी के बाद मातृभाषा हिंदी और अन्य संविधान द्वारा मान्यता प्राप्त 22 भारतीय भाषाओं(आठवीं अनुसूची) के उत्थान का जो सपना देखा गया था अब तक वह सपना दस्तावेजों, कार्यक्रमों तथा संस्थाओं में दबकर रह गया था, लेकिन अब भारत की शिक्षा नीति में एक अलग ही क्रांति देखने को मिल रही है। 


मातृभाषा के माध्यम से शिक्षा ग्रहण करते हुए बच्चे अन्य भाषाओं को आनंदपूर्वक सीखें तो यह सर्वथा न्यायसंगत तथा उचित ही कहा जा सकता है। अब तक हम देश में मैकाले की शिक्षा पद्धति को ढ़ो रहे थे लेकिन अब धीरे धीरे इसमें काफी बदलाव आ रहे हैं। आज मातृभाषा में शिक्षण के साथ अनेक अन्य आवश्यकताएं भी हैं जो हर भारतीय को भारत से जोड़ने और विश्व को समझने में सक्षम होने के लिए बहुत आवश्यक व जरूरी हैं।


 राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने कहा था, ‘भारतीय भाषाओं में पढ़े विज्ञानी और विशेषज्ञ देश के सच्चे सेवक होंगे और वे विदेशी नहीं, बल्कि आम जनता की भाषा बोलेंगे। जो ज्ञान वे प्राप्त करेंगे, वह आम लोगों की पहुंच के अंदर होगा।’ बहरहाल, यह वाकई बहुत ही काबिलेतारिफ है कि आज केंद्र सरकार द्वारा प्रवर्तित नई शिक्षा नीति बापू के इसी सोच के अनुरूप है, जिसमें प्राथमिक से लेकर तकनीकी और मेडिकल शिक्षा तक को मातृभाषाओं में उपलब्ध कराने का प्रयास किया जा रहा है। आज मातृभाषा में शिक्षा सामाजिक न्याय की दिशा में एक बहुत ही महत्वपूर्ण कदम कहा जा सकता है। कहना ग़लत नहीं होगा कि आज दुनिया में जितने भी विकसित देश हैं, उनको उनकी स्थानीय भाषाओं के कारण ही देश दुनिया में बढ़त मिली है। 


ज्यादातर देश अपनी मूल भाषाओं का ही उपयोग करते हैं और यही कारण भी है कि आज दुनिया में वे बहुत आगे हैं और लगातार ऊंचाइयों को छू रहे हैं। कितनी बड़ी बात है कि आज जो लोग अंग्रेजी नहीं बोल सकते,उनकी उपेक्षा की जाती है, जबकि हिंदी बहुत ही सशक्त, शानदार, जानदार, वैज्ञानिक शब्दावली लिए हुए ग़ज़ब की भाषा है और हमारे देश की मातृभाषा का दर्जा हिंदी को प्राप्त है। भाषा कोई भी हो, उसे सीखना कतई बुरा नहीं है। सभी भाषाएं अपने आप में अच्छी और बेहतरीन हैं लेकिन अपनी मातृभाषा को छोड़कर,उसे तिरस्कृत करके दूसरी भाषाओं को अपनाने को सही नहीं ठहराया जा सकता है। 


बहरहाल, अखिल भारतीय शिक्षा समागम के उद्घाटन समारोह के दौरान हमारे देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने यह बात कही है कि सामाजिक विज्ञान से लेकर इंजीनियरिंग तक के विषय अब भारतीय भाषाओं में पढ़ाए जाएँगे। उन्होंने कहा कि जब छात्र किसी भाषा में आत्मविश्वास रखते हैं, तो उनका कौशल और प्रतिभा बिना किसी पाबंदी के उभर कर सामने आता है। उन्होंने कहा कि दुनिया भारत को नयी संभावनाओं की नर्सरी के तौर पर देख रही है और कई देश अपने यहाँ भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) के परिसर खोलने के लिए सरकार से संपर्क कर रहे हैं। यह हमें गौरवान्वित करने वाली बात है कि  दो आईआईटी परिसरों - तंजानिया में एक परिसर और अबू धाबी में एक परिसर का संचालन शुरू होने वाला है, और आज स्थिति यह है कि कई बड़े वैश्विक विश्वविद्यालय भी हमसे लगातार संपर्क कर रहे हैं। वे भारत में अपने परिसर(कैंपस) खोलने में रुचि दिखा रहे हैं।


 प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने यह बात कही है कि एनईपी(राष्ट्रीय शिक्षा नीति) का लक्ष्य भारत को अनुसंधान एवं नवोन्मेष का केंद्र बनाना है। इस नीति में ज्ञान की पारंपरिक प्रणालियों और भविष्योन्मुखी प्रौद्योगिकी को समान महत्व दिया गया है। अंत में यही कहूंगा कि मातृभाषा से हमारा जुड़ाव इस कदर होता है कि हम सोचते भी मातृभाषा में हैं और घर में भी मातृभाषा में ही बात करते हैं। यहां तक कि हम सपने भी मातृभाषा में ही देखते हैं। और यदि हमें अपनी भाषा में कुछ सिखाया जाता है तो इसे हम बहुत ही जल्दी सीख लेते हैं। नई शिक्षा नीति से शिक्षा क्षेत्रीय भाषाओं में दी जानी है इसलिए पुस्तकें भी 22 भारतीय भाषाओं में भी होंगी। निश्चित रूप से इससे शिक्षा के क्षेत्र में तो क्रांति आएगी ही, साथ ही हमारा देश भाषाओं के क्षेत्र में नये सोपानों, प्रतिमानों को गढ़ सकेगा।


आर्टिकल का उद्देश्य किसी की भावनाओं को ठेस पहुंचाना नहीं है।

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