संपूर्ण विश्व के लिए यह अत्यंत गंभीर चिंता का विषय हो सकता है कि बीती एक सदी यानी कि सौ सालों में में ही फूड डायवर्सिटी खत्म हो गई। फूड डायवर्सिटी यानी कि खाद्य जैव-विविधता। यहां सबसे पहले हमें यह जानने की जरूरत है कि आखिर फूड डायवर्सिटी या खाद्य जैव विविधता है क्या ? और इसका दुनिया पर क्या प्रभाव पड़ सकता है अथवा पड़ रहा है ? तो इस संबंध में जानकारी देना चाहूंगा कि (जैसा कि विकीपीडिया से हमें जानकारी मिलती है कि) खाद्य जैव विविधता को 'भोजन के लिए उपयोग किए जाने वाले पौधों, जानवरों और अन्य जीवों की विविधता, प्रजातियों के भीतर, प्रजातियों के बीच और पारिस्थितिक तंत्र द्वारा प्रदान किए गए आनुवंशिक संसाधनों को कवर करने वाली विविधता' के रूप में परिभाषित किया गया है।
- सुनील कुमार महला
सरल शब्दों में कहें तो खाद्य विविधता(फूड डायवर्सिटी)से तात्पर्य सब्जियों, फलों, अनाज, मांस, मछली और डेयरी उत्पादों जैसे खाद्य समूहों की संपूर्ण श्रृंखला से विभिन्न प्रकार के भोजन से है। बहरहाल, कहना बिल्कुल भी ग़लत नहीं होगा कि मनुष्य हो या कोई भी जीव, उन्हें जीवित रहने के लिए भोजन की आवश्यकता होती है, क्यों कि भोजन से ही हम व सभी जीव पोषण प्राप्त करते हैं। जीवन को सुचारू रूप से चलाने के लिए भोजन मनुष्य व किसी भी जीव की प्रथम व मूलभूत आवश्यकता है। इस पृथ्वी पर सभी जीवित जीव अलग-अलग प्रकार का भोजन खाते हैं, ग्रहण करते हैं। भोजन हमारे शरीर की आंतरिक गतिविधियों को भी ऊर्जा प्रदान करता है ताकि वे सुचारू रूप से क्रियान्वित हो सकें। खाद्य विविधता उन खाद्य पदार्थों की विभिन्न किस्मों को कहते हैं जिन्हें हम अपने आहार में लेते हैं जो हमारे शरीर को पोषक तत्व प्रदान करते हैं। कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, वसा, फाइबर, विटामिन, खनिज और पानी प्राथमिक भोजन घटक हैं।
बहरहाल, हाल ही में फूड एंड एग्रीकल्चर ऑर्गेनाइजेशन (एफएओ) के हवाले से यह बात सामने आई है कि एक सदी(सौ सालों में)में दुनिया से 90% से भी ज्यादा अनाज की किस्में गायब हो चुकीं हैं ।अब जो वैराइटी या किस्में या प्रजातियां बाकी हैं, उसमें से भी 9 प्रजातियां ही सबका पेट भर रही हैं। वास्तव में यह बहुत गंभीर और संवेदनशील मसला है कि दुनिया से अनाज की विभिन्न किस्में धीरे धीरे गायब होती चली जा रही हैं।आज धरती से विभिन्न जीव-जंतुओं की नस्लें ही नहीं विभिन्न वनस्पतियां, यहां तक कि अनाज की विभिन्न किस्में भी धीरे धीरे गायब हो रही हैं। यह संपूर्ण मानव जाति के लिए गंभीर खतरा इसलिए है, क्यों कि विश्व की आबादी लगातार बढ़ रही है और अनाज की किस्में गायब होने से मनुष्य के समक्ष पोषण की गंभीर समस्या जन्म ले सकती है। बल्कि यह कहना ग़लत नहीं है कि आज के समय में विश्व की आबादी केवल नौ प्रजातियों से अपना पेट भर रहीं हैं।
आज अनाज की विभिन्न किस्मों का इतनी तेजी से खात्मा हो रहा कि अब वो दिन दूर नहीं जब दुनिया में अनाज की इक्का-दुक्का किस्में बाकी रह जाएंगी। वास्तव में इसे ही हम एग्रोबायोडायवर्सिटी के नाम से जानते हैं।एफएओ के अनुसार पिछले सौ सालों में जिन फसलों की विभिन्न किस्में गायब हुई हैं उनमें क्रमशः चावल, तिलहन, दाल और मिलेट्स(मोटा अनाज )की भी कई वैराइटी शामिल हैं। एफएओ के अनुसार , आज जो फसलें हम उपभोग कर रहे हैं, साल 2050 तक उनमें से भी एक-तिहाई खत्म हो जाएंगी। पाठकों को यह जानकार हैरानी होगी कि फिलहाल जितनी फसलें बाकी हैं, उनमें से भी चावल, गेहूं और मक्का जैसे कुछ ही अनाज दुनिया का पेट भर रहे हैं। आज अधिक पैदावार लेने के लिए इतनी हाइब्रिड किस्में बन चुकी हैं कि अब उत्पादन भले ही ज्यादा होता है लेकिन उसमें पोषण की मात्रा बहुत कम रहती है। हरित क्रांति से फसलों का उत्पादन तो अवश्य बढ़ा लेकिन संकर किस्मों या हाइब्रिड किस्मों से उनकी गुणवत्ता (पोषक तत्व वगैरह) में कमी आई। फसलों के पेटेंट से भी काफी हद तक प्रभाव पड़ा क्योंकि इंडस्ट्रीयल पेटेंट कंपनियों द्वारा कम कीमत पर अनाज की सप्लाई की जाने लगी और इससे विभिन्न फसलों का उत्पादन करने वाले किसान इन पेटेंट कंपनियों द्वारा उपलब्ध कराए जाने वाले सस्ते अनाज पर निर्भर हो गये और उन्होंने स्वयं फसलों का उत्पादन करना तक छोड़ दिया। ग्लोबल क्रॉप डायवर्सिटी ट्रस्ट के अनुसार, होमोजीनस(एक तरह की) यानी धरती पर एक तरह की फसलों के शेष बचने से सबसे बड़ा डर भुखमरी का है।
जमीन पर बार-बार एक ही तरह की फसलें उगाई जाती रहीं तो वो बंजर होती जाएगी, क्यों कि एक ही प्रकार की फसलों को बोने से धरती की उर्वरा शक्ति पर असर पड़ता है। इतना ही नहीं, टिड्डी हमला जैसी घटनाओं में भी इजाफा हो सकता हैं। कई दूसरे तरह के कीड़े-मकोड़े हैं जो फसलों को चट कर सकते हैं। ऐसे में हमारे पास बचने का जरिया नहीं रहेगा।अगर एक भी फसल बुरी तरह से फेल हुई तो बचे हुए अनाज की कीमत काफी बढ़ जाएगी और इसके बाद मामला भुखमरी तक ही नहीं रहेगा, बल्कि अनाज के लिए देशों में जंग तक भी छिड़ सकती है। अतः हम यह कह सकते हैं कि पहले के अनाज की तुलना में आज पैदा किए जा रहे अनाज में पोषक तत्व कम हैं और जो किस्में खत्म हुई हैं, वे रख रखाव के कारण हुईं हैं।
हमने अनाज उत्पादन बढ़ाने की ओर तो ध्यान दिया लेकिन उस चक्कर में यानी कि संकर या हाइब्रिड किस्मों के चक्कर में फसलों की वैरायटी से हाथ धो बैठे। यह भी एक कारण है कि मिलेट्स की कई किस्मों की जगह लोग लंबे चावल या बारीक गेहूं खाने लगे हैं। वर्तमान में भारत से जो फसलें गायब हो रहीं हैं उनमें क्रमशः मोठ बीन(मटकी दाल) जो विशेषकर कर्नाटक में पैदा होती थी, तेजी से खत्म हो रही है क्यों कि लोग इसके स्थान पर अरहर की दाल अपने भोजन में शामिल करने लगे हैं और किसानों ने इसे उपजाना लगभग लगभग बंद सा कर दिया है।
इसी प्रकार से छत्तीसगढ़ का काला कर्हानी चावल, दंतेवाड़ा का महेर धान(काला चावल), मेघालय का लाल चिपचिपा चावल, उड़ीसा के रायगढ़ा और कालाहांडी के जौ-बाजरा के स्थान पर अन्य अनाज या हाइब्रिड अनाज आ गये हैं और ये मार्केट से लगभग लगभग नदारद हैं। पहले के जमाने में कुछ परंपरागत समाजों द्वारा, आदिवासियों द्वारा व कुछ विशेष जनजातियों द्वारा विषम जलवायु परिस्थितियों में अनाज की अनेक किस्में पैदा की जाती थी, जो पौष्टिकता से ही भरपूर नहीं थी अपितु वे विपरीत जलवायु परिस्थितियों में आम आदमी के जीवन यापन का प्रमुख जरिया भी थीं। निश्चित रूप से फूड डायवर्सिटी का खत्म होना मानव सहित धरती के जीव जंतुओं के लिए भी कोई शुभ व अच्छा संकेत नहीं कहा जा सकता है।
अनाज मनुष्य के जीवन का एक जरिया है और दलहन, तिलहन, धान , गेंहू व मिलेट्स जिसे हम मोटा अनाज भी कहते हैं, कि दुर्लभ प्रजातियों का धीरे धीरे इस धरती से गायब होना कहीं न कहीं मानव को संकट में डाल सकता है। बताया जा रहा है कि गायब हो रही प्रजातियों में सबसे ज्यादा किस्में धान की ही हैं। यह मानव के लिए इसलिए भी एक बड़ा खतरा है क्यों कि गेहूं के बाद धान सबसे ज्यादा आबादी द्वारा उपभोग में लाया जाता है।
आधुनिक समाज में आम आदमी का चावल और गेहूं की हाइब्रिड किस्मों के उपभोग के प्रति मोह ज्यादा है और शायद यही कारण भी है कि प्रजातियां गायब हो चलीं हैं। आज परंपरागत बीज विभिन्न बहुराष्ट्रीय बीज कंपनियों के कारण प्रचलन से बाहर हो गए क्यों कि इन कंपनियों ने किसानों को ज्यादा पैदावार का लाभ तो जरूर दिया लेकिन मुनाफा कमाकर अनाजों की किस्मों की मौलिकता को उन्हें हाइब्रिड बनाकर खत्म कर दिया और इसका परिणाम यह हुआ कि कालांतर में परंपरागत बीज लुप्तप्राय ही हो गये।
सच तो यह है कि हरित क्रांति की भी इन परंपरागत बीजों को खत्म करने में भूमिका है। बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने उन्नत किस्म के बीजों को विभिन्न शोधों और अनुसंधान से हासिल करने के बाद उन्हें पेटेंट करा लिया। वास्तव में सच तो यह है कि इन बहुराष्ट्रीय बीज कंपनियों ने फसलों के ऐसे बीज तैयार किये जिसके जरिये किसान एक फसल तो ले सकता था, लेकिन उसे बीज के रूप में फिर इस्तेमाल नहीं कर सकता था। यानी एक फसल उगाने के बाद बीज के लिये उसे फिर बीज तैयार करने वाली कंपनियों से ही बीज खरीदना पड़ता था।
शुरुआती दौर में बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने सस्ती कीमत पर अनाज के बीज दिये, जिसके चलते विश्व के अनेक विकासशील व निर्धन देशों के किसान अपनी परंपरागत फसलों के बीजों को छोड़कर बीज उत्पादक कंपनियों पर निर्भर हो गये, जिसने इस संकट को गहरा किया। हालांकि यह काबिलेतारिफ बात है कि भारत सरकार ने हाल ही में वर्ष 2023 को अंतरराष्ट्रीय मोटा अनाज वर्ष मनाया है और परंपरागत बीजों को बढ़ाने की दिशा में एक नायाब व अभिनव पहल की है।
आर्टिकल का उद्देश्य किसी की भावनाओं को ठेस पहुंचाना नहीं है।
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