बिकती है आत्मा, बेचने वाला चाहिए

बिकती है आत्मा, बेचने वाला चाहिए



- रामविलास जांगिड़


अंतर आत्मा की आवाज जाने कैसे, कौन, कब, कहां सुन ले कुछ कहा नहीं जाता। अंतर आत्मा की बात कौन नेता कब, कैसे अपने पक्ष में गुन ले कुछ कहा नहीं जाता। चुनाव काल में नेताओं की अंतर आत्मा जागती है। उनकी आत्मा एक पार्टी से दूसरी पार्टी की ओर भागती है। किसका दूध किसकी मलाई! चतुर सुजान मत कर ढिलाई! दल दलांतर दलातुर दलाभिमुखी भटकती आत्मा समझे कुर्सी हित में ही अपनी भलाई! इतने दिन अंतर आत्मा सोई पड़ी थी। बुद्धि खोई पड़ी थी। बेचारी जनता तो रोई पड़ी थी। जनता ने अंतर आत्मा को जगाने के लिए खूब उपाय किए। सच्चाई के खूब वास्ते दिए। 



कुर्सी पर बैठकर सत्ता मद में आत्मा हरगिज न जागी। कुर्सी छिनने के डर से आत्मा इस पार्टी से निकलकर उस पार्टी की ओर भागी। पहले थे दागी, अब बन गए हैं रागी। भागती हुई अंतर आत्मा एक दूसरे पर झूठ के बम डालती है। विचारधारा को बड़े-बड़े कूड़ेदानों में डालती है। सत्ता में बने रहने के लिए आत्मा चाटुकार बन कुत्ते पालती है। इन दिनों बंगाली नेताओं की आत्मा भरपूर जाग रही है। 


सब जगह की आत्मा कुल-बुला रही है। जहां-जहां भी चुनाव की ऋतु आती है, बुरे-बुरों की आत्मा भी जाग जाती है। एक पार्टी में हाथ, दूसरी में टांग और तीसरी में सशरीर भाग जाती है। दल बदल रहे हैं। दल दल-दल हो रहे हैं। हर एक आस्तीन में नए नाग पल रहे हैं। नए दल का दुपट्टा ओढ़ने के लिए गले मचल रहे हैं।


शास्त्रों में कहा गया है कि आत्मा अजर अमर है। न इसे काटा जा सकता है और ना ही इसे बांटा जा सकता है। लेकिन आत्मा को बेचा-खरीदा जरूर जा सकता है। राजनीति की मंडी में आत्माएं बेची-खरीदी जाती है। मैं भी सोच रहा हूं कि मेरी आत्मा को बेच दूं। इधर अच्छा मोलभाव कर रहा हूं। जैसे ही कोई ढंग का रोकड़ा मिलेगा आत्मा को बेच डालूंगा। छोटे लोगों की छोटी आत्मा और छोटा मोल भाव! बड़े लोगों की बड़ी आत्मा और बड़ा-बड़ा भाव! बड़ी-बड़ी आत्माएं नीलाम होने के लिए सज-संवर चुकी है। 


मार्केट में उसने अपना मूल्य निर्धारित कर दिया है। इस कुर्सी से उस कुर्सी, उस पद से इस पद तक बिकती आत्माएं! सांप नाथ जी ने कहा की अंतरराष्ट्रीय नाग बचाओ रैली में आपको अपनी आत्मा बेचनी है, भाव बताइए! मैंने एक कचोरी चाय और 100 रुपए में अपनी आत्मा बेच दी। मेहनत मजदूरी और पेट पालने के लिए यह बुरा सौदा नहीं है। मैंने कचोरी खाई डकार ली। यह जो अभी अपान वायु चल रही है; बिकी आत्मा के बदले खाई कचोरी का ही पुण्य प्रताप है। इसीलिए सांप नाथ जी के बताए नारों की हुंकार भरी। 


रैली का रेला चल निकला। रेला बन गया मेला और फिर हो गया झमेला! बिकती है आत्मा, बेचने वाला चाहिए! तुन्नन-तुन्ना, झक झक जुन्ना! तुन्नन-तुन्ना, झक झक जुन्ना!अंतर आत्मा की असली आवाज यही होती है- 'हे अपार्थ! उठ! इस नीति, ज्ञान और विवेक के चक्कर में मत उलझ! अब मन में किसी तरह का कोई संशय मत पाल! उठ और मुझे बेच डाल! खरीददार बैठे हैं राजनीति की हर एक डाल! मंडरा रहे हैं आत्मा के दलाल!'

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