जिन्दगी कभी कभी नीम के पेड़ जैसी है

जिन्दगी कभी कभी नीम के पेड़ जैसी है

 - प्रियंका माहेश्वरी

जिन्दगी कभी कभी नीम के पेड़ जैसी है

जरा सी धूप, जरा सी छांव की तरह है

कभी सावन के झूलों जैसी राहें हैं

कभी ऊपर कभी नीचे.... ऊंची ऊंची पेंगे

और कभी मंझधार में अटकती राह है


मेंहदी के रंग से सजी मोहब्बत

हाथों से आती सोंधी खुशबू

यूं ही इश्क़ बयां कर देती है

चूड़ी बिंदिया काजल और कंगन

ये तो यूं ही जलाती हैं


राह देखता मायका कुछ अपनों का

जहाँ बहू बेटियों की बात ही निराली है

संग सहेलियों के कुछ पल बिताने

सावन की बात ही निराली है


तीजों का त्यौहार,

भाई बहनों का प्यार

मांओं का दुलार

झूले पर खेलता बचपन

सावन की यह हरियाली बड़ी मतवाली है


पिया का साथ है और

नैनों में अंजुरी भर

सपनों की सौगात है

देखो वो आया परदेसी

कि अब मिलन की आस है




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