इस तरह से धनखड़ ने चुनाव जीत लिया। नतीजे आते ही प्रधानमंत्री से लेकर सभी केंद्रीय मंत्री, विपक्ष के नेता, राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने धनखड़ को बधाई दी। हालांकि, कुछ समय बाद ही उनकी इस जीत से ज्यादा मार्गरेट अल्वा की हार के चर्चे होने लगे।
उपराष्ट्रपति चुनाव के नतीजे आने के चंद मिनट बाद विपक्ष की उम्मीदवार मार्गरेट अल्वा ने ट्विट किया। उन्होंने जगदीप धनखड़ को बधाई देते हुए लिखा, 'मैं विपक्ष के उन सभी नेताओं और सभी राजनीतिक दलों के सांसदों का शुक्रिया करती हूं, जिन्होंने इस चुनाव में मुझे वोट दिया। उन वॉलेंटियर्स का भी धन्यवाद जिन्होंने कम समय ही सही, लेकिन बिना स्वार्थ के मेरे चुनाव का प्रचार किया।'
आगे अल्वा ने कुछ राजनीतिक दलों पर निशाना भी साधा। लिखा, 'यह चुनाव विपक्ष के लिए एक साथ काम करने, अतीत को पीछे छोड़ एक दूसरे के बीच विश्वास बनाने का अवसर था। दुर्भाग्य से कुछ विपक्षी दलों ने एकजुट विपक्ष के विचार को पटरी से उतारने के प्रयास में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से भाजपा का समर्थन करना चुना। मेरा मानना है कि ऐसा करके इन पार्टियों और उनके नेताओं ने अपनी साख को नुकसान पहुंचाया है।'
अल्वा ने आगे लिखा, 'यह चुनाव खत्म हो गया है। हमारे संविधान की रक्षा, हमारे लोकतंत्र को मजबूत करने और संसद की गरिमा बहाल करने की लड़ाई जारी रहेगी।'
क्यों हो रहे अल्वा की हार के चर्चे?
1. विपक्ष एकजुट नहीं हो पाया : राष्ट्रपति चुनाव की तरह ही उपराष्ट्रपति चुनाव में भी विपक्ष बिखरा नजर आया। बल्कि पहले से ज्यादा बिखराव उपराष्ट्रपति चुनाव में दिखा। इस बार तो भारतीय जनता पार्टी की धुर विरोधी तृणमूल कांग्रेस तक ने विपक्ष की उम्मीदवार का साथ नहीं दिया। चुनाव हारने के बाद अल्वा के बयान में भी यही दर्द झलका। भाजपा ने बड़े आराम से दोनों चुनाव में विपक्ष को एकजुट होने से रोक दिया।
2. कांग्रेस पर भी उठे सवाल : आमतौर पर सत्ता से बाहर रहने के दौरान विपक्ष का नेतृत्व कांग्रेस ही करते आई है। हर बार उसे क्षेत्रीय दलों का साथ मिलता रहा है, लेकिन इस बार हालात अलग हैं। अब कांग्रेस के नेतृत्व पर ही क्षेत्रीय दल सवाल उठाने लगे हैं। इसके पीछे कारण भी है। कहा जा रहा है कि कांग्रेस अब नेतृत्व नहीं कर पा रही है। इन दलों का ये भी कहना है कि अगर वह कांग्रेस के साथ आते हैं तो इसका उन्हें नुकसान उठाना पड़ता है। यही कारण है कि तृणमूल कांग्रेस, सपा, टीआरएस, आम आदमी पार्टी समेत तमाम दल अलग मोर्चा ही बनाने में जुटे हैं। अल्वा की हार के बाद तीसरे मोर्चे के गठन की चर्चा और तेज हो गई है।
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