देश में कार्यपालिका की कार्यशैली पर हमेशा प्रश्नवाची चिन्ह अंकित होते रहे हैं। किसी सड़क हादसे के बाद कुछ क्षणों के लिए व्यवस्था जागती है। संवेदनायें व्यक्त की जातीं हैं, मुआवजे की घोषणा होती है, कुछ अधिकारियों की बैठक होती है, कुछ वाहनों की जांच के आदेश निकलते हैं और फिर जिंदगी अपनी पुरानी रफ्तार पर लौट आती है लेकिन उन परिवारों की जिंदगी कभी सामान्य नहीं होती जिनके परिजन किसी बस की आग में जलकर, किसी सड़क दुर्घटना में कुचलकर या किसी अवैध रूप से संचालित यात्री वाहन में दम घुटने से हमेशा के लिए चले जाते हैं। आम आवाम के टैक्स से जमा होने वाले पैसों से भारी पगार उठाने वाले कार्यपालिका के उत्तरदायी अधिकारों को क्या केवल हादसों में मृतकों की गिनती करने के लिए ही नियुक्त किया गया है। नोएडा के यमुना एक्सप्रेसवे पर दिल्ली से महोबा जा रही एसी स्लीपर बस का हादसा इसी असहज सवाल को फिर हमारे सामने खड़ा करता है। विगत 24 सितंबर की रात करीब 11 बजे बस में आग लगी और नौ यात्री जिंदा जल गए। बस में करीब 35 यात्री सवार थे। पुलिस जांच में आपातकालीन निकास के काम न करने, रास्ते में सामान भरे होने और यात्रियों के निकलने में कठिनाई जैसी बातें सामने आई हैं। कहा जाता है कि यात्रियों ने आग जैसी गंध आने की शिकायत भी की थी किन्तु चालक-परिचालक द्वारा उसे नजरअंदाज कर दिया गया। इस हादसे का सबसे विचलित करने वाला पहलु केवल नौ मौतें नहीं बल्कि वह पूरा तंत्र है जिसमें एक यात्री बस कई स्तरों पर नियमों की अनदेखी के बावजूद सड़क पर चलती रहती है। हादसे वाली बस बिहार में पंजीकृत है, उसका संचालक मध्य प्रदेश का है, फिटनेस प्रमाणपत्र राजस्थान से और प्रदूषण प्रमाणपत्र हरियाणा से लिया गया है। बस पर 19 चालान और लगभग 1.75 लाख रुपये का जुर्माना होने की जानकारी भी सामने आई है। एक बस कई राज्यों की प्रशासनिक सीमाओं को धड़ल्ले से पार करती रही। संचालन पथ पर स्थापित सबंधित विभागों के किसी भी कार्यालय ने अपने दायित्वों की पूर्ति की होती तो निश्चय ही यह मौतें नहीं होतीं। इस तरह की अनेक घटनायें होती रहीं हैं। बानगी के तौर पर मई 2024 में हरियाणा के नूंह में कुंडली-मानेसर-पलवल एक्सप्रेसवे पर एक यात्री बस आग की चपेट में आई थी। उसमें नौ लोगों की मौत हुई और 15 से अधिक यात्री घायल हुए थे। उस बस में लगभग 60 यात्री सवार थे और प्रत्यक्षदर्शियों ने बताया था कि मुख्य दरवाजा जाम हो गया था तथा यात्रियों को खिड़कियों से निकलना पड़ा। सन् 2025 में राजस्थान के मनोहरपुर के निकट एक निजी बस में ओवरहेड हाई-वोल्टेज तार से संपर्क के बाद आग लगी, जिसमें दो श्रमिकों की मौत और दस लोग घायल हुए। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने स्वतः संज्ञान लेते हुए संबंधित राज्य के मुख्य सचिव और पुलिस महानिदेशक से रिपोर्ट मांगी थी। बस में 50 से अधिक श्रमिक सवार थे। इसी तरह के आंकडों का विस्तार बहुत लम्बा है। फरवरी 2026 में सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय ने राज्यसभा में बताया था कि देश में 49,616 पंजीकृत स्लीपर कोच हैं। उसी जवाब में मंत्रालय ने जैसलमेर-जोधपुर और कर्नूल-बेंगलुरु की घातक बस आग की घटनाओं के बाद सुरक्षा मानकों में गंभीर कमियां स्वीकारी थीं। कहीं बस की लंबाई अनुमति की सीमा से अधिक थी तो कहीं आपातकालीन दरवाजे मानक के अनुरूप नहीं थे। कहीं यात्रियों की सीटें आपात निकास का रास्ता रोक रही थीं तो कहीं अग्निशमन व्यवस्था निर्धारित मानकों के अनुरूप नहीं थी। मंत्रालय ने साफ कहा था कि ऐसी कमियां वाहन के प्रमाणन और फिटनेस निरीक्षण के समय स्थानीय परिवहन अधिकारियों द्वारा पकड़ी जानी चाहिए थीं। इस जबाव के बाद भी किसी उत्तरदायी अधिकारी को दण्डित नहीं किया गया। किसी सरकारी सेवाकर्मी को मौतों के लिए जिम्मेवार नहीं माना गया। ऐसी बसों के मालिकों पर क्या कार्रवाही हुई, किसी को नहीं मालूम। निजी स्लीपर बसों में यात्रियों के लिए बनाए गए ढांचे के साथ-साथ ज्यादा सामान ढोने की भी व्यापक व्यवस्था भी दिखाई देती है। बस के निचले हिस्से में अतिरिक्त खंड बनाकर माल रखा जाता है तथा ऊपर दो-मंजिला स्लीपर बनाए जाते हैं। ज्यादा मुनाफा कमाने के लिए बस के अन्दर की आवागमन वाली गैलरी तक में सामान भर लिया जाता है। यात्रियों की संख्या, सीटों की चौड़ाई, आपात निकास, अग्निशमन यंत्र, वायरिंग, एसी सिस्टम और वाहन की वास्तविक संरचना आदि सब कुछ व्यवसायिक मुनाफे की गणित के हवाले कर दिया गया है। नोएडा हादसे की जांच में भी रास्ते और सीटों के नीचे सामान भरे होने की बात सामने आई है। कहा तो यहां तक जा रहा है कि महोबा के कबरई क्षेत्र की पत्थर मंडी में ब्लास्टिंग के लिए अवैध विस्फोटक भी इस रूट की निजी बसों में निरंतर जाता है जिसकी पूरी जानकारी संबंधित विभागों को रहती है। बसों का सार्वजनिक स्थानों से सवारियां भरना, एक ही मार्ग पर मनमाने किराये की वसूली, क्षमता से अधिक यात्री, सड़क किनारे अनधिकृत ठहराव और लंबी दूरी की बसों का लगातार संचालन किसी से छिपा नहीं है। अनेक विधानसभाओं के दस्तावेजों में भी विभिन्न क्षेत्रों में यात्रियों के डग्गामार वाहनों के इस्तेमाल और निजी वाहनों द्वारा इसका लाभ उठाने की समस्या उठ चुकी है परन्तु परिणाम ढाक के तीन पात से आगे कभी नहीं पहुंचे। परिवहन विभाग के पास फिटनेस, जांच, परमिट आदि का अधिकार है। पुलिस के पास यातायात और कानून-व्यवस्था की जिम्मेदारी है। अग्निशमन विभाग सुरक्षा मानकों से जुड़ा है। जीएसटी विभाग वाणिज्यिक गतिविधियों और कर अनुपालन को देखता है। आबकारी विभाग का अपना नियामकीय क्षेत्र है। ऐसे में वर्षों से निरंतर नियम विरुद्ध संचालन कैसे चल रहा है। सरकार के बडे-बडे बजट डकारने वाले विभागों के ओहदेदारों के कर्तव्यों की समीक्षा की पारदर्शिता आम आवाम तक क्यों नहीं पहुंचती। नोएडा हादसे में दो ड्राइवर और परिचालक गिरफ्तार किए गए हैं तथा बाद में ट्रैवल कंपनी के प्रबंधक की गिरफ्तारी की खबर भी सामने आई है मगर उत्तरदायी बस मालिक अभी तक सलाखें के पीछे नहीं पहुंचा है। जांच केवल चालक, परिचालक, प्रबंधक तक सीमित रहती है या मालिक सहित उस पूरी श्रृंखला तक पहुंचती है जिसने वाहन को फिट घोषित किया, परमिट दिया, सड़क पर चलने दिया और अनेक उल्लंघनों के बावजूद रोक नहीं पाया। डिजटल युग में जहां स्लीपर बस मालिकों द्वारा वेबसाइट पर सुविधाओं की घोषणा, बुकिंग आदि की व्यवस्था की गई है वहां बस के चालक का नाम, उसका ड्राइविंग लाइसेंस नम्बर, बस मालिक का नाम, बस की फिटनेस, परमिट, बीमा, प्रदूषण, अग्निसुरक्षा, आपात निकास, सीट क्षमता और लंबित चालानों का रिकॉर्ड भी उपलब्ध होना चाहिए ताकि यात्री को बस के समस्त दस्तावेजों की पूरी जानकारी रहे परन्तु नक्कारखाने में तूती का आवाज सुनने वाला कोई नहीं हैं। कार्यपालिका की मनमानियों के कारण लोग मरते हैं और फिर कुछ दिनों बाद वही बसें, वही रास्ते, वही अवैध संचालन, वही मालिक और वही प्रशासनिक उदासीनता वापस दिखाई देने लगती है। ऐसे संवेदनशील मामलों में न तो विपक्ष की रुचि सामने आती है और न ही कथित बुद्धिजीवियों की जुबान खुलती है। ऐसे में यह कहना अतिशयोक्ति न होगी कि कानून को चिढाकर सडकों पर दौडती यमराज बनी बसें कार्यपालिका की मनमानियों के सहारे मौतों का खुला तांडव कर रही हैं। इस बार इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने नोएडा में यमुना एक्सप्रेसवे पर स्लीपर बस में आग लगने से 9 यात्रियों की मौत की घटना पर स्वतः संज्ञान लिया है। न्यायमूर्ति सौरभ श्याम शमशेरी की पीठ ने जनहित याचिका कायम कर उसमें पूर्व की ऐसी ही दुर्घटनाओं का भी उल्लेख किया।उत्तरप्रदेश के मुख्य सचिव, पुलिस महानिदेशक और परिवहन विभाग के अपर मुख्य सचिव ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से न्यायालय के समक्ष उपस्थित होकर घटना के विस्तार सहित गई कार्रवाई की जानकारी दी। न्यायालय ने बसों की नियमित जांच की शैली में सुधार की आवश्यकता जताई। न्यायालय ने कहा कि अगर दुर्घटनाग्रस्त बस ने मानकों का पालन नहीं किया तो चालक-परिचालक के साथ लाइसेंसधारी के खिलाफ भी ऐक्शन लिया जाए। न्यायालय ने राज्य सरकार को हलफनामा दाखिल करने के निर्देश दिए, जिसमें पिछले तीन वर्षों में जारी परमिट, जांच प्रक्रिया, सीमा जांच चौकियों, यात्री सुरक्षा जांच और आपराधिक कार्रवाई का ब्योरा भी मांगा है। अब देखना यह है कि उत्तरप्रदेश के उच्च न्यायालय की पहल को देखते हुए अन्य राज्य भी इसी तरह के कठोर कदम उठाते हैं या नहीं। इस बार बस इतना ही। अगले सप्ताह एक नये मुद्दे के साथ फिर मुलाकात होगी।
Dr. Ravindra Arjariya
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