- डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा
राजनीति में व्यक्ति की निजी छवि का असर कितना, कितनी दूर तक और कितनी जल्दी पड़ता है इसका जीता जागता उदाहरण इंग्लैण्ड में ऋषि सुनक की ताजपोशी से देखा जा सकता है। जिस तरह से पिछले कुछ महीनों के घटनाक्रमों से इंग्लैण्ड में टोरियों की छवि तेजी से प्रभावित हो रही थी और खासतौर से ट्र्स के आने के बाद टोरियों का समर्थन आंकड़ा जिस तेजी से गिरने लगा और यहां तक कि विरोधी लेवर पार्टी के समर्थन का आंकड़ा छलांग लगाने लगा वहीं आंकड़ा अब सुनक के प्रधानमंत्री बनने के साथ ही टोरियों का सुधरने और विरोधियों का घटने लगा है।
इसमें कोई दो राय नहीं कि पिछले कुछ सालों में कंजरवेटिव पार्टी या यों कहें कि टोरियों को लेकर यूएस में लोगों में निराशा आई और देश के सामने संकटों का दौर चला वह जादूई छड़ी घुमाने की तरह कम होने वाला नहीं है। दरअसल ब्रेक्जिट का निर्णय कहीं ना कहीं यूरोपीय देशों को सुहाया नहीं है वहीं इससे इंग्लैण्ड के सामने चुनौतियों का पहाड़ भी खड़ा हुआ है। कोढ़ में खाज यह कि कोरोना के दुष्प्रभाव, आर्थिक मंदी, पार्टी मेें भीतरी मतभेद व एकजुटता में कमी, महंगाई की चरम स्थिति, आर्थिक मंदी के कारण सामाजिक तनाव के हालात और रहा सहा रुस यूक्रेन युद्ध के कारण देश के हालात बिगड़ते ही गए। रही सही कमी 45 दिन के ट्रस के शासन से पूरी कर दी और ट्र्स के बजटीय निर्णयों ने हालात को और अधिक तेजी से बिगाड़ दिया। ट्र्स के निर्णयों का परिणाम इसी से साफ समझा जा सकता है कि मात्र 45 दिनों में ही ट्र्स को पूरी तरह से विफल होना पड़ा और पदत्याग का निर्णय करना पड़ा।
ऋषि सुनक के भारतीय मूल के होने से देश में जहां खुशी का माहौल है और इंग्लैण्ड के नेताओं की भारतीय सोच के प्रति जिस तरह की प्रतिक्रियाएं रही थी उन्हें कोट कर अब इसे राष्ट्रीय गौरव के रुप में देखा जा रहा है। हांलाकि भारतीय मूल के लोगों में जैनेटिक गुण है कि वे पक्ष विपक्ष से उपर उठकर निर्णय करते हैं वहीं अपनों पर निर्णय करने से पहले दस बार सोचते हैं कि कहीं पक्षपात का आरोप नहीं थोप दिया जाए। इसलिए भारतीयों को अपने इस जैनेटिक गुण के कारण गर्व भी करना चाहिए तो दूसरी और ऋषि सुनक से भारत के पक्ष में आंख मींचकर निर्णय करने की गलत फहमी भी नहीं पालनी चाहिए। खैर यह विषयांतर ही होगा। पर इतना स्पष्ट है कि आज इंग्लैण्ड ही नहीं भारत सहित दुनिया के देश सुनक की और आशा की नजर से देख रहे हैं। इसका बड़ा कारण भी है। कोरोना की महामारी से दुनिया के देशों ने सबक नहीं लिया है। रुस यूक्रेन युद्ध इसका जीता जागता उदाहरण है। दुनिया के देश आर्थिक मोर्चें पर तो जूझ ही रहे हैं वहीं आपसी तनाव, जलवायु परिवर्तन के कारण आए दिन आने वाले तूफानों, जंगलों में आगजनी और आतंकवादी गतिविधियों से दो चार हो रहे हैं। खाद्यान्न संकट अलग है। ऐसे में तनाव के हालातों में कुछ अधिक हासिल करना बड़ी बात होगी।
ऋषि सुनक के आने के बाद एक सप्ताह में ही इंग्लैण्ड में कंजरवेटिव पार्टी पर लेवर पार्टी की 27 अंक की बढ़त घटकर 16 फीसदी रह गई है जबकि अभी तो सुनक ने सही तरीके से काम करना ही शुरु नहीं किया है। टोरियों का जन समर्थन 23 फीसदी से बढ़कर 28 प्रतिशत हो गया तो लेवर पार्टी का समर्थन 50 प्रतिशत से घटकर 44 प्रतिशत पर आ गया। इससे दो बातें साफ हो जानी चाहिए कि पिछले कुछ माहों में टोरियों ने खोया ही खोया है तो सुनक के आने के बाद कुछ पाने की शुरुआत होने लगी है। करीब दो माह पहले जब सुनक को पीछे छोड़ते हुए ट्रस प्रधानमंत्री बनी तो उन्हांने लोगों की आशाएं बहुत जगाई पर केवल 45 दिनों में ही पूरी तरह से विफल होकर मजबूरन पद छोड़ना पड़ा वहीं ना चाहते हुए भी आखिरकार सुनक को चुनना पड़ा। दरअसल कोरोना काल में इकोनोमिक वेल आउट और स्वास्थ्य संकट के दौर में जिस तरह से सुनक ने काम किया उसकी सराहना के साथ ही सुनक की छवि पर भी असर पड़ा। अब सुनक के सामने अपनी पार्टी और देश का आर्थिक मोर्चों पर आगे बढ़ाने का दोहरा संकट है। जहां पार्टी में एकजुटता बनाना बड़ी चुनौती है तो विदेश नीति को लेकर भी बड़ी चुनौती है। अभी तक रुस यूक्रेन युद्ध में इंग्लैण्ड आंख मींच कर अमेरिका के साथ है। इसी तरह से उत्तरी आयरलैण्ड से व्यापार को लेकर भी समाधान खोजना होगा। भारत इंग्लैण्ड मुक्त व्यापार समझौता भी एक अहम मुद्दा है।
हिन्दुस्तानी सोच से देखे तो यह सकारात्मक हो सकती है पर वहां के माहौल के अनुसार तो इसे समस्या के रुप में ही देखा जा रहा है कि बेकाबू महंगाई और मुश्किल जीवन यापन के चलते इंग्लैण्ड में तलाक रुक गए हैं। आपसी तनाव व अवसाद के कारण तलाक के हालात बन रहे हैं पर केवल और केवल महंगाई के कारण वहां पर तलाक में तेजी से कमी आई है। लोग एकल आय पर घर लेकर खर्च चलाने की आज की तारीख में सोच ही नहीं सकते इससे सामाजिक-आर्थिक हालातों का पता लग जाता है। खैर इसे सकारात्मक ही माना जाना चाहिए कि सुनक के आने से इंग्लैण्ड के लोगों में नई आशा का संचार हुआ है तो टोरियों के प्रति आमजन की सोच में सकारात्मक बदलाव आने लगा है। यह कहना तो अभी जल्दबाजी होगी कि इंग्लैण्ड के हालात सुधर जाएंगे या सुनक की नीतियां सफल होगी पर इतना साफ है कि लोगों को सुनक से बहुत कुछ आशाएं हैं। अब सुनक के सामने बड़ी चुनौती इंग्लैण्ड की खोई साख को बचाने और देशवासियों में विश्वास जगाने की है। सुनक को देश दुनिया के हित में कड़े फैसले लेने से भी नहीं हिचकना चाहिए क्योंकि आज आमआदमी सख्त व कड़वे फैसलों का स्वागत करने लगा है। आशा की जानी चाहिए कि सुनक इसमें सफल रहेंगे।

