दक्षिण भारत का द्वार कर्नाटक जहां राजनीतिक घमासान मचा हुआ था और सत्ता की आंख मिचौली चल रही थी। भाजपा धुआंधार प्रचार और आक्रमक रुख अपनाये हुये हिंदुत्व के मुद्दे को उठाए हुए थी। बजरंग दल, हिजाब, हलाला, हिंदुत्व के मुद्दों का असर कहीं नहीं दिखा। दक्षिण कन्नड़, उत्तर कन्नड़ और उडुपी क्षेत्र भाजपा के चुनावी एजेंडे से अछूते रहे। उन्होंने हिंदुत्व की राजनीति को नकार दिया।
- प्रियंका वरमा माहेश्वरी
कर्नाटक में लिंगायत समुदाय एक बड़ा वोट बैंक है जिसे भाजपा ने साधने की कोशिश की, उन्होंने वोकालिग्गा को 6% और लिंगायत समुदाय को 7% आरक्षण देने की बात रखी। दलित, आदिवासी और ओबीसी को भी अपने पक्ष में करने में विफल रही। वहीं कांग्रेस ने अमूल के बहाने लोकल वर्सेस बाहरी मुद्दे को साधा साथ ही अल्पसंख्यक, दलित ओबीसी को अपने पाले में लाने में सफल रही। लिंगायत समुदाय में भी अपनी पैठ बनाने में सफल रही। बता दें कि बीएस यदुरप्पा, जगदीश शेट्टार, लक्ष्मण सावदी लिंगायत समुदाय का प्रतिनिधित्व करते हैं।
कांग्रेस ने स्थानीय मुद्दों पर ज्यादा फोकस किया। मलिकार्जुन खड़गे कर्नाटक से हैं और इसी साल पार्टी अध्यक्ष भी बने हैं और कर्नाटक में जो भी चुनावी नतीजे रहे उसमें स्थानीय नेतृत्व का महत्व ज्यादा रहा। स्थानीय नेतृत्व में सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार का अच्छा योगदान रहा।
कर्नाटक जीत में राहुल की भारत जोड़ो यात्रा का भी बहुत बड़ा हाथ रहा है। कर्नाटक के जिन 7 जिलों से होकर उनकी यात्रा गुजरी उनमें 48 विधानसभा सीटें आती हैं और कांग्रेस ने वहां 66% सीटें जीती 2018 से दुगनी। 2018 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने इन जिलों में 48 विधानसभा सीट में से सिर्फ 15 पर जीत हासिल की थी। वहीं इस बार कांग्रेस ने 48 में से 32 पर जीत दर्ज की है।
इसमें कोई शक नहीं कि बैकफुट पर रही कांग्रेस को इस जीत ने एक संजीवनी बूटी देने का काम किया है। कांग्रेस विपक्ष की एक बड़ी पार्टी के रूप में उभर रही है क्योंकि यह जीत एक बड़े राज्य में और बड़े अंतरों से हासिल हुआ है फिर भी अभी भी पार्टी को एकजुट होने की ज्यादा जरूरत है। अब राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में चुनाव होने वाले हैं और इन तीनों राज्यों में भाजपा बनाम कांग्रेस का मुकाबला होगा।
अच्छे प्रदर्शन के लिए एकजुटता जरूरी है। राज्य स्तर से हटकर राष्ट्रीय स्तर पर एकजुटता जरूरी है। प्रबंधन और संगठित होना ही बेहतर प्रदर्शन का जरिया बन सकता है। विपक्षी एकता की बात हमेशा होती रहती है क्योंकि भाजपा के ताकतवर नेता नरेंद्र मोदी के सामने विपक्ष का कौन सा चेहरा सामने होगा इस पर हमेशा संशय बना रहता है।
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