रिपोर्ट:- सत्यम सिंह
अंबेडकरनगर। दलहनी एवं तिलहनी फसलों से अच्छा उत्पादन लेने के लिए फसलों की नियमित देखभाल के साथ कीटों का प्रबन्धन करने के लिए दवाओं का प्रयोग बहुत ही आवश्यक होता है। आलू, सरसों एवं मटर की फसल को झुलसा से बचाव के लिए शाम के समय प्रक्षेत्रों में धुंआ करने के साथ यदि दवाओं का छिड़काव नहीं किया गया तो उत्पादन में कमी आ सकती है।जिला कृषि रक्षाधिकारी / जिला कृषि अधिकारी डॉ0 पीयूष राय ने किसानों की जानकारी हेतुु रेनबोन्यूज से वार्ता करते हुए कहा कि आलू की अगेती एवं पिछैती फसल में झुलसा रोग लगने की प्रबल सम्भावना इस मौसम के चलते हो गया है जिससे कहीं-कहीं आलू के फसल की पत्तियों पर भूरे एवं काले धब्बे बन रहें हैं। उन्होंने इसके बचाव के लिए मैंकोजेब 75 प्रतिशत डब्लू-पी 500 ग्राम अथवा जिनेब 75 प्रतिशत डब्लू-पी 250 ग्राम 50 लीटर पानी के घोल में प्रति छोटा बीघा छिड़काव करके निदान पाया जा सकता है। गिरते हुए तापमान के चलते सरसों की फसल में माहू के प्रकोप से बचाव के लिए एजाडिरैक्टिन 0.15 प्रतिशत ईसी 250 मिलीलीटर या डाईमेथोएट 30 प्रतिशत ईसी 250 मिलीलीटर या आक्सीडिमेटान मिथाइल 25 प्रतिशत ईसी 250 मिलीलीटर 100 लीटर पानी के घोल में प्रति बड़ा बीघा में छिड़काव कर कीटों से बचाया जा सकता है।
x
उन्होंने मटर की फसल में लगने वाले मिल्डयू रोग के नियंत्रण के लिए कारआक्सी क्लोराइड 50 प्रतिशत डब्लू-पी 600 ग्राम या जिनेब 75 प्रतिशत डब्लू-पी 500 ग्राम प्रति बड़ा बीघा में 120 लीटर पानी के घोल में छिड़काव कर रोगों से बचाया जा सकता है। उन्होंने देशी नुस्खे के रूप में शाम के समय खेतों में धुंआ करना भी आवश्यक बताया है।